नोटबंदी – एक तुगलकी फ़रमान

एक गलत निशाने पर चलाया गया तीर, जिसकी योजना बहुत बेकार तरीके से सोची गयी, जिसने लाखों गरीब लोगों के जीवन को बे-वजह नुक्सान पहुंचाया, और जिसे किसी ठोस आर्थिक आधार या देश हित की सोच पर नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ कमाने के लिए चलाया गया

8 मार्च नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर राष्ट्र को संबोधित किया, अपनी उपलब्धियों के बारे में कुछ देर डींगे हांके, और फिर अचानक एक तोप का गोला दाग दिया – उन्होंने आधी रात से प्रभावी ₹ 500 और ₹ 1000 नोटों की नोटबंदी की घोषणा की। [1] जाहिर है, इसका तुरंत ही उनके चमचों और भक्तों द्वारा एक बड़ा “मास्टरस्ट्रोक” कदम के रूप में स्वागत किया गया था – सरकार समर्थक मुख्य स्ट्रीम मीडिया (जो भारत में केवल मीडिया है) में मोदी के चियरलीडर्स इसे काले धन पर मोदी की “सर्जिकल स्ट्राइक”– बताने लगे । जब से अत्यधिक दुहे गए “सर्जिकल स्ट्राइक्स” हुए हैं, इस शब्द का इस्तेमाल भाजपा समर्थकों द्वारा इतना ज्यादा किया जाता है कि मुमकिन है, आपके नगर पालिका द्वारा अगले फॉगिंग को भी “मच्छरों पर मोदी के सर्जिकल स्ट्राइक” करार दिया जा सकता है ।

तथ्यों की जाँच – कुछ बुनियादी आंकड़े

वास्तव में कोई नहीं जानता कि भारतीयों के पास वाकई कितना कुल काला धन है, जाहिर है, यह अर्थव्यवस्था का वो हिस्सा है, जिसको छुपाया जाता है, जिसका हिसाब नहीं रखा जा रहा है।

पहले, स्थिति को समझने के लिए कुछ विभिन्न आंकड़े पेश हैं

विभिन्न आंकड़े के मोटे अनुमान
रूपये में (लाख करोड़) अमरीकी डालर में (बिलियन)
भारत के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद 100.0 1,500
भारत के केंद्रीय बजट में 20.0 293
केंद्रीय बजट में कॉर्पोरेट छूट 5.5 80
संचलन में पैसे 16.5 250
समानांतर अर्थव्यवस्था (20%) -श्नाइडर का अनुमान 20.0 300
काले धन की अनुमानित प्रवाह भारत से बाहर 7.0 100
संपत्ति की बिक्री पर अखिल भारतीय स्टांप शुल्क संग्रह 1.0 15
संपत्ति की बिक्री में इस्तेमाल किया काले धन के मोटा अनुमान 2.0 30
सोने के आयात (~ 900 टन) 2.4 36
सोना खरीदने का इस्तेमाल किया काले धन के मोटा अनुमान 0.8 12
भारत में कुल व्यक्तिगत धन 304.0 4500
भौतिक संपत्ति में व्यक्तिगत धन 132.0 1,980
-भौतिक संपत्ति (सोना) 66.0 990
-भौतिक संपत्ति (प्रॉपर्टी ) 56.0 800
वित्तीय संपत्ति में व्यक्तिगत धन 172.0 2,520
-वित्तीय संपत्ति(नकद ) 16.0 250

चलिए पीएम मोदी के दावे के साथ चलते हैं, कि अगर भारत का विदेशों में जमा सारे काले धन को वापस लाया जाता है, तो हर भारतीय ₹15 लाख प्राप्त कर सकते हैं (चुनावी भाषण याद है, जिसे कि भाजपा अध्यक्ष ने खुद एक जुमला कहा था?)। तो विदेशों में जमा काला धन ₹15 लाख x 126 करोड़ भारतीय = ₹ 1890 लाख करोड़ है। बहुत ज्यादा है ना? चलो मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री ने कहा कि हर भारतीय नहीं, हर परिवार (5 व्यक्तियों का परिवार) , को ₹ 15 लाख मिल सकता हैं। तो फिर हम ₹ 378 लाख करोड़ (₹ 1890 लाख करोड़ / 5 प्रति परिवार व्यक्तियों) पर पहुंचते  है, जो हम विदेशों में जमा काले धन की राशि मान लेंगे ।

यह अनुमान, सबसे बड़ा उपभोक्ता एफएमसीजी कंपनी के सह-संस्थापक, प्रख्यात विशेषज्ञ बाबा रामदेव द्वारा विदेशों में जमा ₹ 400 लाख करोड़ काला धन के आंकडे के काफी करीब है।

अब प्रधानमंत्री ने ₹ 500 और ₹ 1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है – कथित तौर पर, काले धन पर अंकुश लगाने के लिए। लेकिन ₹ 500 और ₹ 1000 के सभी प्रतिबंधित नोटों (काले + सफेद) का कुल मूल्य  सिर्फ ₹ 14.18 लाख करोड़ है, जो कि  विदेशों में जमा 378 लाख करोड़ काला धन का सिर्फ 3.75% है। भारत में पिछले आयकर छापों के आंकड़े बताते हैं कि सब काले धन की बरामदगी में कैश सिर्फ मात्र 6% ही बरामद होता आया है! यहां तक कि अगर ₹ 500 और ₹ 1000 के नोटों की 20% काला धन है, यह  विदेशों में जमा काले धन का सिर्फ 0.675%है। मात्र ₹ 255,000 Cr. [2] अब, ₹ 2.55 लाख करोड़ के साथ ₹ 378 लाख करोड़ की तुलना करें। नोटबंदी के नाटक को देखिये !

मोदी के प्रतिबंध से प्रभावित राशि विदेशों में जमा काले धन का सिर्फ 0.675% है.

दूसरे शब्दों में, नोटबंदी के नाटक के माध्यम से मोदी द्वारा लक्षित भारत में मौजूद काले धन की तुलना में विदेशों में जमा काला धन “150 गुना अधिक ” है ।

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असल में, मोदी ने खुद कहा है कि काले धन का बड़ा हिस्सा भारत में नहीं, लेकिन विदेशों में जमा है, । उनके शब्द थे:

“भारत का बच्चा बच्चा जानता है की काला धन कहाँ रखा हुआ है, ये स्विस बैंकों में रखा है, क्या हमें ये काला धन वापस नहीं लाना चाहिए?: नरेंद्र मोदी”
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तो मतलब कि प्रधानमंत्री ने, कुल काले धन के सिर्फ 0.675% (मात्र ₹ 255,000 करोड़) के लिए  99% भारतीयों को गरीबी और असीम परेशानियों का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है, जबकि वो 1% अमीर, जो 99% से अधिक काले धन के मालिक हैं, अपने जीवन का आनंद लेने के लिए स्वतंत्र हैं? क्रूर है ना? 99% साधारण भारतीयों जानते हैं कि वो 1% – जो वास्तव में काले धन के मालिक हैं, कभी भी लंबी कतारों में खड़े नहीं होंगे। कभी नहीं.

अगर मोदी चाहते, वह सिर्फ अपने दोस्त अदानी को सरकार बैंकों को अपने कर्ज का भुगतान करने को कह देते, तो भी इस अभियान से जो कुछ बाहर आ सकता है उसकी तुलना में काफी अधिक बरामद हो सकता था। लेकिन उनकी बकाया राशि का भुगतान करने के लिए “1 व्यक्ति” अदानी को कहने के बजाय मोदी ने “समूची भारतीय जनसंख्या” को अपने नोटों को बदलने के लिए कतार में खड़े होने के लिए मजबूर कर दिया है। सोचिये! 1 अदानी बनाम 126 करोड़ भारतीय!.  हम बाद में देखेंगे, नोटबंदी का सबसे मज़ेदार हिस्सा है, कि  इस नाटक के माध्यम से भारतीय सरकार या लोगों को कुछ भी मिलने नहीं जा रहा हैं! परेशानियों और बेकार के खर्चों को छोड़कर।

क्रेडिट सुइस की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष के रूप में, भारत  के शीर्ष 10 कॉरपोरेट्स 7 लाख करोड़ के का क़र्ज़ लिए हुए हैं  (मोदी नोटबंदी नाटक के माध्यम से लक्षित अधिक से अधिक 2.55 लाख करोड़ काला धन का 3 गुना)। अदानी समूह पर ₹ 96,031 करोड़ का सकल कर्ज था, Essar Group ₹1 लाख करोड़, GMR समूह ₹47,976 करोड़, GVK समूह ₹33,933 करोड़, Jaypee समूह ₹75,163 करोड़, JSW समूह ₹58,171 करोड़, Lanco समूह ₹47,102 करोड़, Reliance समूह ₹1.25 लाख करोड़, Vedanta समूह ₹1.03 लाख करोड़ और Videocon समूह ₹45,405 करोड़. मोदी ने अगर सिर्फ इन 10 लोगों से क़र्ज़ लौटाने को कहा होता तो, हो सकता है भारत इस नोटबंदी ड्रामा के बिना और बेहतर हो गया होता।  [3]
इसके अलावा, अगर उद्देश्य काले धन पर अंकुश लगाना था, तो ₹ 500 और ₹ 1000 के नोटों को फिर से लागू करने, और यहां तक कि एक नया ₹ 2000 नोट जोड़ने की क्या ज़रुरत थी? सिर्फ बड़े नोटों को ख़त्म किया जा सकता था, जैसा कि मोरारजी देसाई ने 1978 में किया था। यही विपक्ष पूछ रहा है। यही हर आम आदमी पूछ रहा है। लेकिन वहाँ कोई जवाब नहीं है। आखिर, यह सब सिर्फ एक नाटक है।

खैर, चलिए कुछ तीखे सवालों पर चर्चा की जाए।

वास्तविकता की जांच – कुछ बुनियादी सवाल

क्या ₹500 और ₹1000 के नोटों की नोटबंदी से काले धन में कमी आ जायेगी?

नहीं.

बहुत बड़ी मछलियों पर तो वैसे भी कोई असर नहीं पड़ने वाला है, वे अपना काला धन विदेशों में भेज देते है (स्विस बैंकों, पनामा, कुछ याद आया?), और मॉरीशस वगैरह के रास्ते से फिर से भारत में निवेश करते हैं, जिसपर हमारे ही नेता एफ.डी.आई. में हुई बढोतरी के नाम पर ढिंढोरा भी पीटते हैं! भारत में अमीर और ताकतवर, जिनमें से किसी के पास अगर कैश में कुछ काला धन यहाँ पर होगा भी, तो वो सरकार को धोखा देने के जुगाड़ निकाल ही लेंगें, चाहे वो पुरानी तारीख की बिलिंग करा कर, या अपने ड्राइवर का जन धन खाते के माध्यम से हो।

काले धन रखने वाले  पहले से ही ₹500 और ₹1000 के नोट 15-20% कमीशन पर बदल रहे हैं। इससे फर्क सिर्फ इतना है कि मूल मालिक के पास अब 80% (₹100 के नोटों में, लेकिन अभी भी काले ही) है और एजेंट ने 20% कमा लिया है। क्या ये कमीशन एजेंट आयकर का भुगतान करेंगे? तो कुल काला धन तो अभी भी उतना ही रहता है। कुछ लोग सोना खरीद रहे हैं, जिसकी कीमत लगभग 30,000/10 ग्राम से लगभग दोगुना ऊपर पहुंच गई है, यहां पर भी वही सिद्धांत लागू होता है। कुल काला धन कम नहीं हुआ. हाँ , काले धन रखने वालों की संख्या ज़रूर बढ़ गयी. ये कमीशन एजेंट काले धन के नए मालिक बन गए. बेशक, मूल मालिक का काला धन 80% तक कम हो गया है, लेकिन वो तो अब भरपाई करेगा, उसने जिस भी तरीके से काला धन कमाया था, अब वापस फिर उसी तरीके से और जोर शोर से कमाने की कोशिश करेगा, ताकि नुक्सान पूरा हो। केवल ईमानदार लोगों को ही कष्ट भुगतना होगा।

नोटबंदी की नौटंकी से कुल काले धन में कोई ख़ास कमीं नहीं आने वाली। केवल काले धन रखने वालों की संख्या में ज़रूर वृद्धि होगी।

तो मोदी की नोटबंदी से भारत सरकार या भारत के लोगों को आखिर क्या हासिल होगा?

वास्तव में, कुछ भी नहीं.

यदि काले धन का मालिक स्वेच्छा से अपने ही काले धन का खुलासा करता है, और उस धन पर 30% टैक्स + 200% की सजा को भुगतान करता है, तो सरकार के कर राजस्व मिल जाएगा। पर क्या कोई ऐसा करेगा? जबकि ऐसा करने पर उसे 30% + 60% = 90% का भुगतान करना पड़ेगा, और उसके हाथ मात्र 10% सफेद पैसा आएगा, जबकि वह सिर्फ 20% का भुगतान या काले बाजार में सोने को खरीदकर अपना 80% काला धन रखने का जुगाड़ कर सकता है? नहींं। याद रहे की यह व्यक्ति पहले ही काला धन रखने वाला एक बेईमान इंसान है. याद है? इसलिए सरकार को कुछ भी नहीं मिलने जा रहा है, बस आम ईमानदार लोगों को परेशान किया जा रहा है, और उनपर अत्याचार हो रहे हैं।इस नोटबंदी के नाटक की वजह से कुछ गरीब लोग पहले से मर चुके हैं।

इस नोटबंदी के नाटक से सरकार या भारत के लोगों को कुछ भी नहीं मिलने वाला है।

क्या मोदी की नोटबंदी से भारत की अर्थव्यवस्था को कुछ भी फायदा होगा?

नहीं. बेशक, सफेद पैसे वाले लोग भी अपने ₹500 और ₹1000 के नोटों को बैंकों (निजी या सार्वजनिक) में अस्थायी रूप से जमा करने के लिए मजबूर हो जाएंगे, लेकिन उससे बैंकों का भाग्य बदलने नहीं जा रहा है सभी बैंकों में कुल लगभग 109 लाख करोड़ के आसपास की राशि जमा है, जैसा कि आप नीचे एक चार्ट में देख सकते हैं। सभी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के बीच सिर्फ 14 लाख करोड़ एक साथ जमा होने वाला है। अगर एक या दो महीने के लिए हर एक नोट बैंकों में जमा किया जाता है (वैसे लोग उल्टा कर रहे हैं, 500, 1000 के नोटों को 100 में बदलने में लगे हुए हैं), जो बैंकों की मदद करने नहीं वाला है। [4]

इसके विपरीत, सभी खुदरा कारोबार को कम से कम एक सप्ताह के लिए, नहीं के बराबर व्यापार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 2% (यदि साल के 52 सप्ताह में से 1 सप्ताह के लिए व्यापार बंद कर दिया जाता है)। वास्तव में, भारत की पीपीपी प्रति व्यक्ति आय (₹ 122 प्रति घंटे, प्रति वर्ष अमेरिका $ 5,350, को 8 घंटे के काम वाले दिन में परिवर्तित करके) के आधार पर, अगर हर भारतीय अपने ही पैसों को बदलने या पाने के लिए औसतन कतार में सिर्फ 1 घंटे भी खर्च करता है, तो यह भारत के लोगों को ₹122 x 126 करोड़ = ₹ 15,000 करोड़ का नुकसान है ।[5] इस कदम के एक सप्ताह के भीतर, बंबई स्टॉक एक्सचेंज सेंसेक्स से लगभग ₹6 लाख करोड़ का नुक्सान हो गया था।

इसके अलावा, यह अगर कदम बैंक की स्थिति में सुधार लाने के लिए उठाया गया था, तो क्यों ना पहले श्री अदानी और दूसरों को उनकी बकाया राशि लौटने के लिए मजबूर किया जाए?

सिर्फ नए नोट छापने में ही पहले से ही भारत को कम से कम ₹12,000 करोड़ का खर्च उठाना पड़ेगा। और वास्तव में ऐसा लगता है कि यह सब कुछ नाटक, एकदम बे-वजह ही किया जा रहा है ।[6]

नोटबंदी के नाटक में भारतीय लोग, सरकार और अर्थव्यवस्था को कुल मिला जुलाकर नुक्सान ही होगा।

तो क्या मोदी की नोटबंदी का कोई भी फायदा है?

दर-असल सिर्फ एक फायदा है. इस प्रतिबंध से पुराने डिजाइन के जाली नोट समाप्त हो जाएंगे। और ज़ाहिर है भारतीय अर्थव्यवस्था में और अधिक जाली नोट भरने का मौका भी तैयार होगा, जब लोगों को भी ये पता नहीं है की नए नोटों में असली को कैसे पहचानना है । पाकिस्तान और चीन के लिए ₹2000 के नए जाली नोटों को छापना कितना मुश्किल हो सकता है? पहले ही, रिपोर्ट यही आ रही है कि भारतीय रिजर्व बैंक को नए नोटों में किसी भी अतिरिक्त सुरक्षा सुविधाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। तो, मतलब ये है की इन नए नोटों का जाली बनाना भी पुराने नोटों जितना ही आसान होगा ! ₹2000 के नोटों के साथ तो नई काली अर्थव्यवस्था खूब उन्नति करेगी ![7]

लेकिन, यदि उद्देश्य नकली नोटों से लड़ने का था, तो फिर ₹500 और ₹1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगाने की कोई जरूरत ही नहीं थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ ही साल पहले सफलतापूर्वक पुराने नोटों चरणबद्ध तरीके से हटाकर उनके नकली नोटों का सफाया किया था। इसी भाजपा ने, जो कि तब विपक्ष में थी, गरीब लोगों के लिए होने वाली असुविधा के मुद्दों को उठाया भी था, जबकि उस बार यह कदम कहीं अधिक व्यवस्थित तरीके से लिया गया था, कई लोगों को तो पता भी नहीं चला।

वो तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक, जिसका काफी ढिंढोरा पीटा गया, के बाद सीमा पर आतंकी हमले बढ़ ही गए हैं, और ₹500 और ₹1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगाने से भी आतंकी हमलों में कोई कमी नहीं आई है. और फिर, ज़ाहिर है, वहाँ आतंक की फंडिंग है, जो कि अब ₹ 2000 के नोट से और आसानी से की जायेगी। आतंक के प्रायोजकों के पास वास्तव में पैसे की कोई कमी तो है नहीं

इसके अलावा, जिस पैमाने पर नकली नोटों की समस्या के बारे में डराया जाता है, समस्या उतनी गंभीर है नहीं। भारतीय सांख्यिकी संस्थान के एक अध्ययन से पता चला है कि संचलन में हर 10 लाख नोटों में लगभग 250 नकली हैं, यानी कि केवल 0.025% ही। [8]

मुद्रा की सप्लाई में कोई भी कमी डिमांड और फलस्वरूप कीमतों को काम करती है, तो हाँ, एक छोटी अवधि के लिए कुछ कीमतों में कमी की उम्मीद है, विशेष रूप से विलासिता के सामान की, इसपर निस्संदेह ढिंढोरा भी पीटा जाएगा । यह तो केवल पूरी प्रक्रिया के ख़त्म होने बाद तभी साफ़ हो पाएगा, कि कुल मिलकर मुद्रा की सप्लाई में कितनी कमी आएगी – भारतीय रिजर्व बैंक भविष्य में इस पैसे को अपनी बैलेंस शीट में एडजस्ट कर सकता है, या फिर जैसे होने की अधिक संभावना है, सरकार को उधार देने के लिए और अधिक नोट छपेगा।

गौर कीजिये की यदि कोई नोट एक वैध मुद्रा(legal tender) नहीं भी रह जाता है तो उसके धारक के प्रति भारतीय रिजर्व बैंक का आर्थिक दायित्व (liability) तुरंत समाप्त नहीं हो जाता। इसलिए, जिस तरह से सरकार के कई चीयरलीडर दावा कर रहे हैं, उस तरह से ये सारे नोट जो वापस नहीं आएंगे, उनके दायित्व को बैलेंस शीट से मिटाकर एक असाधारण लाभांश (special dividend, Seigniorage) देने की स्थिति पैदा नहीं होगी। जिस प्रकार यकीनन साधन संपन्न लोगों द्वारा अपने काले धन को निकालने के जुगाड़ के रास्ते निकाले जाएंगे, किया जा रहा है, वापस ना आने वाले नोटों की राशि शायद उतनी ज्यादा होगी भी नहीं जितना कि ये चियरलीडर्स उम्मीद कर रहे हैं । [9][10]

खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोडा बारह आना।

लेकिन मैंने तो सुना है की सरकार ने सभी जुगाड़ के लिए पहले से ही जबरजस्त प्लानिंग की हुई है?

आपने भी अब तक WhatsApp वगैरह पर अब तक कुछ कहानियाँ देखी ही होंगी, कि कैसे आयकर विभाग ने फलाने पर छापा मार दिया है, नीचे शायद एक “जय हिंद’ का नारा भी रहा होगा ।

फिर भी, मोदी भक्तों के पास एक आसान से सवाल का कोई भी जवाब नहीं है, “इस तरह के छापे मारने के लिए आखिर नोटबंदी करने की क्या जरूरत थी?”

मोदी समर्थक ये बताते फिरते हैं कि कैसे सरकार के तमाम विभागों ने पहले से ही सभी कमियां सोच ली थीं, कैसे हर किसी के पैन नंबर और आधार कार्ड वगैरह से सरकार किसी भी गलत काम पर नजर रख सकेंगे।

हालांकि, मेरा एक दोस्त है जो एक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में काम करता है, उसने मुझे बताया किवो लोग इस कदम के लिए एकदम तैयार नहीं थे, वे तो केवल एक रजिस्टर में हाथ से लिखकर आईडी/नाम/राशि विवरण को नोट कर रहे हैं। इसलिए ये जरूरी नहीं कि सभी सूचना एक कंप्यूटर पर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से रिकॉर्ड हो रही है। अब सोचिए, अगर 50 करोड़ लोगों को अगले 40 दिनों के लिए हर दिन बैंकों पर नोटों को बदलने के लिए पहुँच जाते हैं, वहाँ अलग अलग तरीके से दर्ज की गई 2,000 करोड़ प्रविष्टियां हो जाएंगी। अगर इस तरह के एक रिकॉर्ड की जांच करने के लिए एक आयकर अधिकारी को 15 मिनट लगते हैं और वह 8 घंटे लगातार काम करता है, तो सिस्टम में डालने के लिए 62.5 करोड़ व्यक्ति-दिन की आवश्यकता होगी। आईटी विभाग को एक वर्ष के भीतर यह काम पूरा करने के लिए 25 लाख लोगों को रोजगार देना होगा!

इस तरह के स्पष्टीकरण देने वाले लोग यह भी मान कर चल रहे हैं, कि सभी आयकर अधिकारी अब अचानक ईमानदार हो गए हैं, और पूरा सरकारी तंत्र अब एकाएक ठीक तरीके से काम करने लग जाएगा।

हमारी अफसरशाही को अचानक जिस बड़े पैमाने पर इस प्रकार की सूचना मिलेगी, और उनका पिछला रिकॉर्ड देखते हुए, मुझे शक है कि वे केवल कुछ भोली भाली जनता को परेशान करने के लिए चुन लेंगे, और वास्तव में इसी बहाने लोगों से और अधिक रिश्वत भी वसूल करेंगे। यदि हमारे सभी सरकारी टैक्स अधिकारी इतने ही ईमानदार और दूध के धुले हुए होते, और हमारे सिस्टम में काले धन की रोकटोक के लिए जो भी जांच के तरीके हैं (पैन नंबर आदि), अगर सचमुच इतने असरदार होते, तो काले धन की इतनी बड़ी समस्या आखिर पैदा ही कैसे होती?

अरुण जेटली ने पहले ही घोषणा की है कि सिर्फ मौजूदा एटीएम मशीनों को ₹2000 नोटों के साथ काम करने लायक बनाने के लिए ही 2-3 सप्ताह का समय लग जाएगा। आज आपके सामने जो नौटंकी हो रही है, उसके बजाय, अगर सरकार ने सच मुच इतना सोच समझ कर इस नोटबंदी की योजना की तैयारी की थी, तो एटीएम मशीनों को पहले से ही ₹ 2000 नोटों के साथ काम करने लायक कर दिया गया होता।

₹ 500 और ₹ 1000 के नोटों की बंदी ने अर्थव्यवस्था से 86% मुद्रा (14 लाख करोड़) को हटा दिया है। मान लिया जाये कि इसमे 20% काला धन था, तो क्या सरकार ने पहले से इसकी जगह लेने वाले नोटों को बदलने के लिए 12 लाख करोड़ के बराबर नोट छापने की कोई भी तैयारी की थी?

सरकार न तो नोटबंदी के लिए तैयार है और न ही गंभीर थी। यह सिर्फ एक नौटंकी है।

लेकिन मैंने तो सुना था कि मोदी जी ने नए नोटों के लिए कोई खास नैनो चिप डिजाइन की  है?

आपने व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर ज़रूर संदेशों को देखा होगा, और ज़ी न्यूज के एक बहुत बदनाम साख वाले दलाल एंकर को भी शायद सुना होगा, जो आपको ये बता रहे थे कि नए नोट में किस प्रकार एक “नैनो एनजीसी चिप”, बिना किसी बैटरी के बावजूद किस प्रकार तिजोरी के अंदर से, या 120 मीटर की गहराई से भी उपग्रहों को अपनी पोजिशन भेज सकती है।

ये इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण है कि आजकल किस प्रकार, और किस स्तर की मूर्खता को ये सफ़ेद झूठ के दलाल बिना किसी भी संकोच के आप तक फैलाते हैं  । जीपीएस तकनीक एक रिसीवर द्वारा कम से कम तीन जीपीएस उपग्रहों से लगातार समय का सिग्नल मिलने से काम करता है। यदि आप अपने स्मार्टफोन में जीपीएस को चालू करेंगे, तो यह बस इन सिग्नलों  को प्राप्त करने में ही बहुत जल्दी आपके फ़ोन की बैटरी को ख़तम करवा देगा। अगर किसी ने एक ऐसे यन्त्र का आविष्कार कर दिया है जो 36,000 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद एक उपग्रह तक पहुँचाने लायक एक मजबूत सिग्नल को बिना बैटरी के ही भेज सकता है, तो उस महान इंसान को भारतीय रिजर्व बैंक या प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं होना चाहिए , उसे अभी तक भौतिकी में नोबेल पुरस्कार मिल जाना चाहिए।

आखिर मोदी ने नोटबंदी का नाटक किया ही क्यों ?

अगर मोदी सच में समानांतर अर्थव्यवस्था को रोकने के बारे में गंभीर था, तो वह बस उच्च मूल्य वर्ग के नोटों को हटा दिया होता। अगर वह काला धन लाने के बारे में गंभीर था, वह विदेशों में काले धन पर हमला करता, जैसा कि भारत में हर बच्चा जानता है। ऊपर, हम पहले से ही चर्चा कर चुके हैं भारत में चल रहा कैश विदेशों में जमा काले धन की राशि का एक बहुत छोटा सा अंश है। तो आखिर मोदी क्यों नोटबंदी के इस निर्णय को लिए?[11]

इसकी सबसे साफ़ वजह यही लग रही है कि नोटबंदी का सम्बन्ध अगले वर्ष प्रमुख राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों से है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन की हार होनी तय है, इस बात को अब सभी मानते हैं। उत्तर प्रदेश में, भाजपा के खिलाफ दलितों का क्रोध को देखते हुए 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बड़ा झटका मिलने की उम्मीद दिख रही है । यहाँ तक कि गुजरात में अपने घर पर भाजपा के पैरों तले जमीन खिसकती हुई दिख रही है। गोवा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख लोग अमित शाह की तानाशाही, और गोवा की स्थानीय राजनीति में रक्षा मंत्री पर्रिकर की जारी दखलंदाजी के खिलाफ खुले विद्रोह में हैं।

दूसरे शब्दों में, मोदी भाजपा के लिए तस्वीर निराशाजनक है।

भारत में चुनाव काले धन के लिए एक प्रमुख “सिंक” के रूप में काम करते हैं। निर्वाचन आयोग की प्रति निर्वाचन क्षेत्र के 70 लाख खर्च की सीमा के बावजूद, यह अनुमान लगाया गया है कि भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान कई हजारों करोड़ रुपये खर्च किए। गैर पारदर्शी फंडिंग वाले सभी दलों का हाल कुछ ऐसा ही है – वे सफेद धन में खर्च चुनाव आयोग को दिखाने के लिए करते हैं, जबकि अपने समर्थकों, स्वयंसेवकों पर इससे कई गुना काले धन और कैश में खर्च करते हैं।[12]

जबकि हम सभी आम जनता को इस बात पर विश्वास करने को कहा जा रहा है कि हमारे किसी भी नेता, उनके क्रोनी पूंजीपति मित्र, भ्रष्ट लोगों को इस नोटबंदी के फैसले की बिलकुल खबर ही नहीं चली थी, कई रिपोर्ट तो यही दिखाते हैं कि सच्चाई कुछ और ही थी. उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल भाजपा 8 नवंबर को कैश में 1 करोड़ रुपये बैंक में जमा किया, ठीक उसी दिन, जिस दिन श्री मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की थी। इस घोषणा से ठीक पहले, भाजपा ने हाल ही में देश के कई जगहों पर कैश देकर जमीन खरीदी है।

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इसके अलावा, इस घोषणा से ठीक पहले, कई भारतीय बैंकों के कुल डिपाजिट में ₹ 5 लाख करोड़ की एक असामान्य वृद्धि देखी  गयी थी ।

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भारतीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने इसकी सफाई में कहा था कि यह वृद्धि 7वें वेतन आयोग के लिए बकाया राशि के भुगतान की वजह से थी। वो हमें ये बताना भूल गए, कि इन वेतन बकाया में कुल ₹34,600 करोड़ की राशि, यानी की डिपाजिट में वृद्धि का सिर्फ 7%, का भुगतान किया गया था ।[13]

तो, हो सकता है की यह नोटबंदी सिर्फ मोदी द्वारा अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियो की नकदी पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रयास था, जबकि उनके अपने का ध्यान रखा गया। यहाँ तक कि विश्व स्तर पर सबसे सम्मानित बिजनेस अखबार, लंदन के फाइनेंशियल टाइम्स, जिनकी राय को मैं एक और तटस्थ बाहर की आवाज के रूप में भारतीय दलाल पत्रकारिता से ज्यादा विश्वसनीय मानता हूँ, ने भी यह सवाल उठाया है कि क्या इस कदम का सिर्फ एक राजनीतिक मकसद था। [14][15]

“कुछ लोगों का ये मानना है की यह कदम राजनीति से प्रेरित था – अगले साल की शुरुआत में राज्य स्तर के चुनाव के लिए, श्री मोदी की छवि को एक मजबूत, निर्णायक नेता के रूप में दर्शाने और अपने प्रतिद्वंद्वियों को उनके कैश से वंचित रखने का इरादा है।”
“… ऐसा तो नहीं था कि कोई जबरजस्त विकास हो रहा था. इस निर्णय के समय से यही लगता है कि इसकी वजह सिर्फ आर्थिक होने के बजाये कुछ और ही थी । “

अभी ही क्यों ?

भारत में रबी फसलों की बुआई दीवाली के कुछ दिनों बाद ही शुरू होती है। भारत के बड़े हिस्से में यह “शादी विवाह का मौसम” भी है। श्री मोदी इस बेहद तबाही मचाने वाले कदम के लिए, संभवतः इससे बुरा कोई समय नहीं चुन सकते थे।

क्या यह सिर्फ घमंड के कारण लापरवाही का नतीजा था, या इस जल्दबाजी में लिए निर्णय के पीछे कुछ और भी है ?.

इससे पहले कि चुनाव अभियान गरमाये, मोदी को यह राजनैतिक कदम उठाने की जरूरत थी। लगातार सुर्खियों में बना रहना, और मोदी-भाजपा के झूठ को उजागर करने वाले असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए, लोगों को गुमराह करने की नयी तरकीबें निकालना ही इस सरकार का पूरे समय का काम लगता है।

एक हफ्ते पहले ही, मोदी-भाजपा OROP मुद्दे पर सेना के एक रिटायर्ड सिपाही की आत्महत्या (जो उनके परिवार पर मोदी-पुलिस के अत्याचारों से और भी शर्मनाक हो गयी), सेना विकलांगता पेंशन की कमी, लगातार आतंकवादी हमलों और हमारे सैनिकों की सीमा पर मौत, छात्र नजीब के लापता होने और नजीब की मां मोदी पर पुलिस के अत्याचारों, भोपाल में फर्जी मुठभेड़ का भांडाफोड़, एनडीटीवी पर बैन और फिर यू-टर्न, आदि मुद्दों से बुरी तरह घिरी हुई नज़र आ रही थी. ऐसे में जरूरी हो गया था की ध्यान हटाने के लिए कुछ नयी सुर्खियों सामने लायी जाएँ । या फिर क्या इसका सम्बन्ध खुद श्री मोदी द्वारा रिश्वत लेने के मामले से था? सहारा और बिरला समूह द्वारा “गुजरात के मुख्यमंत्री” के तहत की गयी प्रविष्टियों का विवरण, जिसे उनके आयकर विभाग ने दफन कर दिया गया था, सामने आ रहे थे. कुल मिलाकर, समुचित और पर्याप्त तैयारी किये बिना, और विशेष रूप से इतने अनुपयुक्त समय पर, इस नोटबंदी के निर्णय को जो जल्दबाजी में लिया गया है, इससे तो यही लगता है कि यह कदम इन सब में से किसी राजनीतिक कारणों से लिया गया है।[16][17]

भाजपा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से 2014 में की जाने वाली नोटबंदी का विरोध किया और फिर खुद अचानक अब यह कदम लिया है, इससे यही साबित होता है कि यह सिर्फ भारत के लोगों को मूर्ख बनाने के लिए एक प्रोपेगंडा के अलावा कुछ नहीं था ।

मोदी की नोटबंदी के नाटक का कुल परिणाम क्या होगा?

इस कदम ने पहले से ही मोदी-भाजपा पर पलटवार का काम शुरू कर दिया है। कई भक्तों ने घोषणा की है कि अब वे मोदी के लिए कभी वोट नहीं करेंगे। लोग नोटबंदी के खिलाफ अपने गुस्से के वीडियो बनाये हैं, और ऐसा हर एक वीडियो वायरल बन गया है। खुद के प्रचार के लिए मोदी की भूख और उसकी चालों का सीधा प्रभाव आम आदमी अपने जीवन पर महसूस कर रहा है, और अब खुल कर बोल रहा है। भाजपा के पास रोने धोने, विपक्ष को कोसना और गाली देने को छोड़कर – इस बड़ी भूल वाले कदम का कोई वास्तव में कुछ भी बचाव नहीं है – कोई आंकड़े नहीं, कोई प्रबंधन नहीं । लेकिन, लोग चाहते हैं की मोदी और उनकी सरकार कुछ काम करे, रोना धोना और नौटंकी मचाना बंद करे।[18]

सोने पर सुहागा तो ये है, कि भारतीयों को एटीएम के सामने अपनी ही मेहनत की कमाई लेने के लिए कतारों में झोंक कर, मोदी खुद दूर जापान चले गए हैं।

अगर कोई अपने जीवन को जोखिम में डालकर आरटीआई के माध्यम से पूछ ले कि मोदी की नोटबंदी की वजह से आखिर  कितना काला धन बरामद हुआ, तो आंकड़ा 0% के करीब  ही होगा ।

इमोशनल अत्याचार

खुद एक असीमित आपदा को फैलाने के बाद, अब श्री मोदी नाजुक पुरुषों और नीमहकीम को जचने वाले भावनात्मक ब्लैकमेल का सहारा लेने पर मजबूर हो गए हैं। “ मेरा जीवन खतरे में है। मुझे जिंदा जला कर सकते हैं …”.

उनके भक्त हमसे पूछते हैं, सैनिकों हमारी सीमाओं खड़े 24 x 7 रक्षा कर रहे हैं, आप देश के लिए कतार में 1 घंटे खर्च नहीं कर सकते? इन्ही भक्तों से अगर आप सवाल करिये कि मोदी ने सेना के रिटायर्ड जवानों को मूल OROP नहीं देकर उनकी पीठ के पीछे से छुरा क्यों घोंपा, या क्यों मोदी ने सशस्त्र बलों के विकलांगता पेंशन को कम कर आधा कर दिया, तो ये आप ही को गालियाँ देने लगेंगे । ऐसी तो इनकी मूर्खता हो गयी है।

वैसे भी, जैसा कि हम पहले से ही ऊपर चर्चा कर चुके है, देश को इस नोटबंदी नाटक द्वारा कुल घाटा हुआ है। लोगों को नुक्सान हुआ है। यहाँ तक कि सैनिकों के परिवारों को कतार में खड़ा कर रहे हैं. यह सब सिर्फ इसलिए कि मोदी ने राष्ट्र को काले धन के खिलाफ कदम लेने के नाम पर बेवकूफ बनाने के लिए ₹500 और ₹1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। ये कितना बड़ा छल है! एक भी भक्त और न ही मोदी या सरकार ने हमको ये बताया है कि वो इस बेवकूफाना कदम के द्वारा कितना काला धन बरामद करने की उम्मीद कर रहे हैं।

देश की खातिर क्या प्रधानमन्त्री अपने मित्रों को भारत को बकाया ₹7 लाख करोड़ का भुगतान करने के लिए नहीं कह सकते?

भद्दा प्रोपगैंडा

अमित शाह और अरुण जेटली (उनके भक्त ब्रिगेड और चीयरलीडर मीडिया के साथ) रोना मचा रहे हैं, पूछते हैं, विपक्षी दाल नोटबंदी के खिलाफ क्यों है? मुझे आश्चर्य है, इशारों में बात करके आरोप लगाने के बजाये वो कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा रहे ? क्या देश मोदी को वेतन इसलिए देता है कि वो पाकिस्तान में नवाज शरीफ की पार्टियों में महंगा सूट पहन कर जाएँ और नृत्य करें? प्रधानमंत्री से पूछो, “क्यों राजनीतिक दलों के पास अभी भी काला धन है”? क्यों चौकीदार सो रहा है? राजनीतिक दलों को कतारों में खड़े होने के लिए मजबूर करो, आम लोगों को नहीं। श्री अमित शाह, कौन भारत में सत्तारूढ़ है? विपक्ष के पास काला धन है, तो उन्हें गिरफ्तार करो और काले धन की वसूली करो। क्या तुम्हारे मोदी राष्ट्रपति ट्रम्प की अनुमति के लिए इंतज़ार कर रहे है?

यह भी सोचिये, जब वह सिर्फ 20% कमीशन भुगतान करके या गोल्ड मार्ग के माध्यम से ₹100 नोटों पाना इतना आसान है, तो किसी काले धन वाले व्यक्ति को इस निर्णय का खुलकर विरोध करने की ज़रुरत ही क्या है, हाँ अगर ऐसा विरोध राजनीतिक रूप से लाभकारी है, तो बात अलग है. 2014 में भाजपा ने नोटबंदी का विरोध किया था इसे गरीब विरोधी कहा था । क्या उस वक़्त भाजपा अपने काला धन के बारे में चिंतित थी, श्री तड़ीपार? 2 साल में क्या बदल गया है? विपक्ष विरोध कर रहा है क्योंकि यह मोदी का नाटक देख रहा है, और वे लोग जनता को यह दिखाना चाहते हैं कि वे लोगों की आवाज उठा रहे हैं। सिर्फ पैसा आपको चुनाव नहीं जितवा सकता है। दिल्ली का 67-3 याद रखें। भाजपा के पास वोट छोड़कर सब कुछ था । दरअसल, यह अजीब और मजेदार बात है जब भाजपा के पास विपक्ष के खिलाफ अकेला तर्क उनके पास काला धन होने का आरोप रह जाता है, यह न केवल भाजपा की अयोग्यता साबित करता है, यह कम से कम विपक्ष से काला धन निकलवाने में मोदी की अक्षमता को भी उजागर करता है ।

जेटली ने कहा, “ईमानदार लोग नोटबंदी के साथ खुश हैं।” अमिताभ बच्चन, अजय देवगन (दोनों पनामा घोटाले में नामित), सुभाष चंद्र (जी के मालिक), अदानी, अंबानी, पंजाब की बादल और यहां तक कि शरद पवार ने भी नोटबंदी का स्वागत किया है, जबकि सोशल मीडिया में मोदी और उसकी नोटबंदी ड्रामा को कोसने वाले, गुस्से से भरे भारतीयों की भरमार है। तो इन के बीच में ईमानदार कौन हैं और काले धन जमा करने वाले कौन हैं?

उपसंहार

कल्पना कीजिये कि एक शिकारी है जो एक तालाब में मगरमच्छ को पकड़ने का कार्य करने के लिए, सारा पानी बाहर निकलवा देता है. मगरमच्छ तो फिर भी जीवित बच जाते है, और उन्हें केवल हलकी सी तकलीफ़ होती है, पर सभी छोटी मछलीयां इस प्रक्रिया में मर जाती हैं।

एकदम यही चीज़ भारत के गरीब लोगों के साथ हुई है।

भारत को हाल के वर्षों में दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही असमानता कहा गया है। क्रेडिट सुइस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट से पता चला है कि भारत का कुल संपत्ति के लगभग आधा सबसे अमीर 1% नागरिकों के हाथ में थी, जबकि सबसे अमीर 10% के पास 74% संपत्ति थी । इस बीच, सबसे गरीब 30%, के पास केवल 1.4% कुल संपत्ति थी। [19]

असली बड़ी मछली जो काले धन की विशाल राशि की जमाखोरी करती हैं शायद केमैन आइलैंड के किसी बार में शैम्पेन पी कर ऐश कर रही हैं, जबकि 99% भारतीयों को एक आपराधी की तरह भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों को सफाई देनी पड़ रही है, और खुद अपनी ही मेहनत की कमाई के पैसे वापस लेने के लिए लंबी कतारों की कठिनाई सहनी पड़ रही है। और ये तो तब का हाल है, जब एक बैंक की एक शाखा आप के पास मौजूद है- भारत के ग्रामीण इलाकों, पहाड़ियों और दुर्गम स्थानों में जहां एक बैंक की निकटतम शाखा आपसे बहुत दूर हो सकती है, वहाँ के लोगों का क्या हाल होगा ये अनुमान लगाइये । भारत के 2.2 लाख एटीएम में से, सिर्फ 2500 ग्रामीण इलाकों में हैं, जहां की 70% भारतीय रहते हैं, 1.4 करोड़ में से केवल 12 लाख व्यापारियों के पास क्रेडिट कार्ड स्वीकार करने वाली मशीन है।

यह नोटबंदी शायद ही काले धन पर एक सर्जिकल स्ट्राइक थी, यह भारत के गरीब लोगों पर एक सर्जिकल स्ट्राइक थी।

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संदर्भ

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