4G घोटाला – जीयो और खाओ

2G स्पेक्ट्रम की नीलामी से अपेक्षित 1,76,000 करोड़ रुपए का 1/10 वां भाग से भी कम खर्च कर, अंबानी ने राष्ट्रव्यापी 4G स्पेक्ट्रम पा लिया, मगर इसका तनिक भी विरोध नहीं हुआ है

भारत में किसी को भी पूछें, “2 जी घोटाले” क्या था, और आपको बताया जाएगा कि किस तरह से, 2 जी स्पेक्ट्रम को 1,76,000 करोड़ रुपये का विशालकाय आंकड़ा है, जिसे “प्राप्त जा सकता था” के मात्र एक अंश के एवज में दे दिया गया था। मीडिया घरानों ने भी इस आंकड़े के बड़ा होने तो दर्शाने के लिए सभी शून्य लिखने का फैसला किया, यह 1,76,000,00,00,000 है।

ठीक है। आइए हम एक क्षण के लिए ये अनदेखा करें कि तत्कालीन दूरसंचार नीति में सरकार के लिए अधिकतम राजस्व प्राप्त करना नीतिगत उद्देश्य के रूप में शामिल नहीं था। अगर 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन वास्तव में एक घोटाला था, और सरकार को इससे 1,76,000 करोड़ रुपये जुटाने चाहिए थे, तो फिर हमें 4 जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से क्या उम्मीद करनी चाहिए?

यदि दोगुना नहीं, तो कम से कम समान राशि तो मिलनी चाहिए ना?

रिलायंस ने देशव्यापी 4 जी स्पेक्ट्रम के लिए इससे बहुत कम राशि का भुगतान किया है, और फिर भी मीडिया किसी भी बेकार के गैर-मुद्दा – बीफ, भारत माता की जय, बोस फाइलें, नेहरू और ना जाने क्या क्या उठाने में ही व्यस्त है।

एक घोटाले की कहानी – कालक्रम में

हमारे देश में “पूंजीवाद” कैसे काम करता है, रिलायंस जियो इसका एक जबरजस्त और शिक्षाप्रद उदाहरण है। चलिए प्रारम्भ से कहानी शुरू कर देते हैं, क्रमशः एक एक चरण में।

चरण 1: एक फर्जी फ्रंट कंपनी चालू करें

आपके पूर्व क्रोनी दोस्तों (नाहटा) के साथ एक लो-प्रोफ़ाइल कंपनी, इन्फोटेल ब्रॉडबैंड सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (आईबीएसपीएल) को चुपचाप स्थापित करें। कंपनी को इतना छोटा रखें कि कोई भी, खासकर प्रतिद्वन्द्वी, को इसका पता भी न लगे. कुल सम्पति: 2.49 करोड़; मात्र 1 ग्राहक; आय 15 लाख रुपये

अब ये भला कौन देख रहा है की इस कंपनी के संस्थापक 90 के दशक में हमारे दूरसंचार उद्योग को तोड़ने के लिए कुख्यात हैं। (एचएफसीएल: कुछ याद आया?) इंफोटेल और कोई नहीं बल्कि हिमाचल फ्यूचरिस्टिक कम्युनिकेशंस लिमिटेड (एचएफसीएल) के प्रवर्तक महेंद्र नहाता के बेटे अनंत नहाता द्वारा संचालित एक छोटा सा इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) था।

पाठकों को याद हो सकता है कि एचएफसीएल ने 1995 में मोबाइल टेलीफोनी के लिए 9 लाइसेंस हासिल किए थे। उनके पास ऐसा करने के लिए वित्तीय क्षमता नहीं थी और अंततः दूरसंचार मंत्री सुखराम ने उन्हें किसी तरह बचाया था। उस समय भी यह अफवाह थी कि एचएफसीएल वास्तव में अंबानी के लिए एक फ्रंट कंपनी था। पाठकों को याद हो सकता है कि एचएफसीएल ने लाइसेंस शुल्क के रूप में सबसे ज्यादा बोली लगाई थी और रिलायंस टेलीकॉम ने सबसे कम बोली लगाई थी। रिलायंस ने कुछ श्रेणियों-सी मंडलियां जैसे उत्तर पूर्व, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा आदि को बहुत कम दाम देकर हासिल किया। जब एचएफसीएल ने लाइसेंस शुल्क का भुगतान नहीं किया, तो भारतीय सरकार ने न केवल 20,000 करोड़ रुपये का राजस्व गंवा दिया, बल्कि कई सर्किलों में मोबाइल जीएसएम को रोल-आउट करने में 2 साल तक की देरी हो गयी थी। [1]

फरवरी 2007 में स्थापित आईबीएसपीएल को नवंबर 2007 में एक अखिल भारतीय आईएसपी लाइसेंस प्रदान किया गया था। 2009-2010 में, इसमें सिर्फ एक लीज-लाइन लाइन वाला ग्राहक था, जिससे उसने 14.78 लाख की आय कमाई थी। 31 मार्च 2009 को इसके बैंक अकाउंट में मात्र 18 लाख रुपये थे, जिसमे 11 लाख रुपये, आईसीपी लाइसेंस के लिए कंपनी द्वारा दिए गए 10 लाख रुपये की बैंक गारंटी के लिए, लगे हुए थे।

चरण 2: नीलामी को धांधली करके जीत जाएँ।

फरवरी 2010 में, दूरसंचार विभाग ने 3 जी और 4 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में भाग लेने के लिए आवेदन आमंत्रित करने का एक नोटिस जारी किया, जो अलग से आयोजित किया जाने वाले थे। यूनीफाइड एक्सेस सर्विसेज / सेल्युलर मोबाइल टेलीफोन सर्विसेज / इंटरनेट सर्विस प्रदाता (यूएएस / सीएमटीएस / आईएसपी) लाइसेंस वाले कोई भी कॉर्पोरेट इकाई स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगा सकती थी। डीओटी के दिशानिर्देशों के मुताबिक कोई भी इकाई जो एक उपक्रम दे सकती है कि वह ऑपरेशन शुरू करने से पहले “नया प्रवेशदाता” लाइसेंस के रूप में यूएएस / आईएसपी श्रेणी ‘ए’ लाइसेंस प्राप्त करेगी, तो उसे ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस (बीडब्ल्यूए) स्पेक्ट्रम के लिए नीलामी में भाग लेने की अनुमति दी गई थी

2008 में और फिर 2010 में, दूरसंचार विभाग ने पहले ही स्पष्ट किया था कि फ़ोन सेवाओं को केवल दूसरी पीढ़ी (2 जी) और 3 जी स्पेक्ट्रम का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। ट्राई ने सिफारिश की थी कि ब्रॉडबैंड और डाटा सेवाओं के तेजी से प्रसार के लिए 4 जी या बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम का उपयोग किया जाना चाहिए।

11 जून, 2010 में, इस संदिग्ध फ्रंट कंपनी को अपने नेट वर्थ के 5,000 गुना बोली लगाने से पूरे भारत में 4 जी ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम मिलते हैं। जी हां, इन्फोटेल ने भारत भर में स्पेक्ट्रम हासिल करने के लिए अपने 2.5 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति का 5,000 गुना भुगतान किया। एक्सिस बैंक की 252.5 करोड़ रुपये से बैंक गारंटी के रूप में एक बयाना राशि जमा करके, जो कि इसकी कुल संपत्ति की एक सौ गुना थी, आईबीएसपीएल बोली लगाने वालों के लिए वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने में कामयाब रहे। इस बैंक गारंटी की प्रामाणिकता के बारे में भी संदेह उठाया गया है, लेकिन यह एक और कहानी है।)  [2] [3]

चरण 3: फ्रंट कंपनी को खरीदें

नीलामी पूरी होने के मात्र एक घंटे के भीतर, खुले-आम इस फर्जी कंपनी को स्पेक्ट्रम की कीमत की तुलना में कौड़ियों के भाव खरीद लीजिये। इन्फोटेल ने सभी 22 सर्किलों में 20 मेगाहर्ट्ज़ (मेगाहर्टज) स्पेक्ट्रम के लिए 12,847.77 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी, और 2552.50 करोड़ रुपये का बकाया धन चुकाया, और उसके बाद कंपनी के 95% हिस्से को रिलायंस इंडस्ट्रीज को 4,800 करोड़ रुपये में बेच दिया। वायरलेस ब्रॉडबैंड लाइसेंस के लिए नीलामी के नतीजे सामने आने के सिर्फ एक घंटे के भीतर। [4]

चरण 4: लाइसेंस परिवर्तित करें

अब वो करिये जिसमें आप और आपके पापा चैम्पियन हैं – लोगों की जेबें गर्म करना।एक स्वतंत्र नियामक (ट्राई) द्वारा विरोध किये जाने पर, सरकार से सहायता के साथ अपने ब्रॉडबैंड लाइसेंस को ध्वनि/फ़ोन सेवा के लिए यूनिफाइड लाइसेंस (“यूएएस”) में परिवर्तित करवा लें । [5]

अप्रैल 2012 में, दूरसंचार विभाग के अनुरोध पर, ट्राई ने लाइसेंसिंग ढांचे को बदलते हुए इसे एक नए यूनिफाइड लाइसेंस व्यवस्था में बदलने के लिए दिशानिर्देश दिए, जो इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (डेटा) को पूर्ण सेवा प्रदाताओं (फ़ोन) में स्थानांतरित करने को आसान बना दिए। दूरसंचार विभाग के एक दूरसंचार आयोग द्वारा ट्राई दिशा निर्देशों पर विचार-विमर्श किया गया था। इसके बाद, अगस्त 2012 में एक और उसी वर्ष सितंबर में, इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं पर बहस करने के लिए दो और समितियां गठित की गईं।

इन विचार-विमर्शों का नतीजा यह था कि फरवरी 2013 में, नए एकीकृत लाइसेंस के लिए आईएसपी लाइसेंस के रूपांतरण को मंजूरी दी गई और रिलायंस जियो इस फैसले का लाभ लेने वाली सबसे पहली कंपनी थी। कंपनी ने अगस्त 2013 में मात्र 15 करोड़ रुपये के एक “प्रवेश शुल्क” और 1,658 करोड़ रुपये का “प्रवास शुल्क” का भुगतान किया और इसे 21 अक्टूबर, 2013 को एक एकीकृत लाइसेंस प्रदान किया गया, जिसने औपचारिक रूप से रिलायंस जियो फ़ोन सेवाएं प्रदान करने के लिए अधिकृत कर दिया। [6]

चरण 5: सीएजी (CAG) द्वारा विरोध

2001 की कीमतों पर 15 करोड़ रुपए के प्रवेश शुल्क और 1,658 करोड़ रुपए की “प्रवासन शुल्क” का भुगतान करके अपने एकीकृत लाइसेंस प्राप्त करें। बहुत आसान!

“2 जी घोटाले” को याद रखें, सीएजी ने 2008 में 2 जी स्पेक्ट्रम के डीओटी के आवंटन में 1.76 लाख करोड़ का नुकसान होने का अनुमान लगाया था। यह वैल्यूएशन 2010 के नीलामी में 3 जी नीलामी से तय मूल्यों का उपयोग करके किया गया था। लेकिन हमारे “जिओ” के दोस्त को 2001 की कीमतों पर अपने 4 जी स्पेक्ट्रम पर आवाज सेवाएं प्रदान करने के लिए लाइसेंस मिला!

हालांकि कैग ने (22,000 करोड़ रुपये) पर भी ऊँगली उठायी, किसी ने भी यह बात नहीं सुनी। वक़्त बदल रहा था।

2013 में तैयार किए गए सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में बहुत कड़े शब्द इस्तेमाल किये गए थे:

    “दूरसंचार विभाग नीलामी की शुरुआत में ही हेराफेरी के एकदम साफ़ चिन्हों को पहचानने में पूरी तरह विफल रहा”

ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है: “सरकार द्वारा इसकी तत्काल जांच की जानी चाहिए, जिन कंपनियों ने नीलामी की शर्तों/नियमों का उल्लंघन किया है, ऐसी बोली लगाने वालों पर जिम्मेदारियों को निर्धारित करना चाहिए, बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम के आवंटन को रद्द करके सांठ-गाठ में धांधली करने वाली कंपनियों पर एक मिसाल कायम करने वाली सजा देनी चाहिए।”

    

“रिलायंस जियो इन्फोकॉम को 22,848 करोड़ रुपये का अनुचित फायदा मिला है,” – सीएजी (CAG) की रिपोर्ट, 2 मई 2014।

चरण 6: लेकिन, आपने इस के लिए एक प्यादा पहले से ही तैयार किया था

अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलें, एक ऐसे मुख्यमंत्री के सर पर हाथ रख दें जो बेहिचक क्रोनी पूंजीवाद के लिए सबसे अच्छा घोड़ा साबित हो सकता है। जयपाल रेड्डी और ए के एंटनी जैसे कुछ ईमानदार यूपीए मंत्रियों ने मुकेशभाई की महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में आना शुरू कर दिया था, इसलिए उन्होंने अपने साथी गुजराती पर दांव लगाने का फैसला किया। मुकेशभाई, होल्डिंग कंपनी नेटवर्क -18 में अपने हितों के माध्यम से अधिकांश भारतीय मीडिया के मालिक हैं। तमाम मामलों में पहले बहुत दाग़ी रह चुके श्री मोदी के दामन से खून के दाग़ मिटाने, और उनकी छवि बदलाव का एक विस्तृत प्रोजेक्ट मीडिया पर चलाया जाता है, मोदी की लहर बनाई जाती है।

चरण 7: आपका प्यादा सत्ता में, सीएजी की रिपोर्ट हल्की

अब जब आपका मोहरा सत्ता में है, तो सीएजी के रवैये में परिवर्तन हो जाता है। नुकसान 22,848 करोड़ रुपये से कम होकर 3,367 करोड़ रुपये से नीचे हो जाता है, अब सब कुछ तेजी से बढ़ रहा है।

“रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड (पूर्व में, मैसर्स इन्फोटेल) … 15 करोड़ रुपये का उल प्रवेश शुल्क और अगस्त 2013 में 1,658 करोड़ रुपये के अतिरिक्त माइग्रेशन शुल्क का भुगतान किया गया था। 2001 में तय की गई कीमतों पर इस प्रवास के परिणामस्वरूप, मेसर्स रिलायंस जियो इन्फोकॉम को 3,367.2 9 करोड़ रुपये रुपये का अनुचित फायदा हुआ “-सीएजी (CAG) की रिपोर्ट, 9 मई 2015

सीएजी ने इस बात का कोई विवरण नहीं दिया कि कैसे “अनुचित लाभ” का आंकड़ा केवल एक साल के दौरान मूल अनुमान के एक छोटे से अनुपात में बदल गया। [7]

हालांकि, अपनी अंतिम रिपोर्ट में भी, सीएजी ने बताया कि दूरसंचार विभाग ने आवाज़ सेवाओं और ऑपरेटरों को प्रदान करने वाले यूएएस /सीएमटीएस ऑपरेटरों द्वारा भुगतान किए जा रहे स्पेक्ट्रम के आरोपों में समानता नहीं बरकरार रखी, जो आवाज सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस का उपयोग कर रहे थे। जबकि यूएएस / सीएमटीएस ऑपरेटर्स स्पेक्ट्रम की मात्रा के आधार पर 2 प्रतिशत और 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के बीच भुगतान कर रहे थे, ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के रूप में समायोजित सकल आय का केवल 1 प्रतिशत का भुगतान करने के लिए कहा गया था।

चरण 8: टैरिफ नियमों का उल्लंघन करें, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता

यदि आपके द्वारा मुफ्त में लुभावने टैरिफ देने के नियमों को तोड़ने पर सवाल उठते हैं तो आप अपने पूर्व कर्मचारी (जो अब सरकार के एजी बन चुके हैं) से पूछिए, कि वो आपको एक खुली छूट दे दें।क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि ट्राई ने 15 साल में किसी भी ऑपरेटर के लिए इस शर्त को कभी भी छोड़ा नहीं था? नहीं, जाहिर तौर पर। [8] [9]

चरण 8: राजस्व का वास्तविक नुकसान

19 जून, 2017 को, दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने वित्त वर्ष 2018 के लिए 47,305 करोड़ रुपये के अपने राजस्व लक्ष्य को पूरा करने में असमर्थता व्यक्त की और वित्त मंत्रालय से यह राजस्व लक्ष्य 29,524 करोड़ रुपये करने के लिए अनुरोध किया – यानी कि लगभग 40 फीसदी गिरावट। [10]

यह न केवल 4जी पर कम 1% स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क का परिणाम था, बल्कि मुफ्त में विभिन्न आक्रामक प्रचार के कारण 2जी और 4जी प्रतिद्वंद्वियों की कमाई भी कम हुई थी।

इस पर चुप्पी क्यों है?

बेशक, इस नुकसान को भी “presumptive” कहा जा सकता है, लेकिन हमने इस शब्द को एक दूसरे युग में, पहले कभी नहीं सुना है, जब दूसरा शब्द आम था: घोटाला क्योंकि घोटाला शब्द ही इस कंपनी के इतिहास का सही वर्णन करता है, फिर भी हम इसके बारे में हम लगभग कुछ भी नहीं सुनते हैं। ना कोई नाराजगी, ना कोई बहस, कुछ भी नहीं।

आप अपने आप से पूछो, क्यों? इतना सन्नाटा क्यूं है भाई?

पहली नजर में, यह 2 जी घोटाले की तुलना में कहीं बड़ी लूट है, तो फिर हमने इसके बारे में मुख्यधारा वाली मीडिया में क्यों कुछ नहीं सुना है? बस गैर-मुख्यधारा के मीडिया श्रोत जैसे द वेयर या साहसिक कारवां मैगज़ीन से कुछ कहानियों को यदि छोड़ दिया जाता है।

उत्तर सरल है: कौन बोल सकता है?

सरकार?

यह अनुमान लगाया गया है कि 2014 में भाजपा ने अपने चुनाव अभियान पर 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च किया था। आखिर किसी ने अपनी जेब से ये पैसा लगाया था, और अब वो चाहते हैं कि अपना निवेश का फायदा वापस लें।

जैसा कि हम ऊपर देख रहे हैं, इस सरकार के तहत कैग ने वास्तव में श्री अंबानी के खिलाफ आरोपों को भी रफा-दफा किया है। हम पहले से ही देखते हैं कि राफेल जैसे रक्षा सौदों से श्री अंबानी और श्री अदानी के लाभ के लिए पुन: सौदा किया गया है। इस बीच, अधिक फ़र्ज़ी इनवॉयस पर कोयले के आयात के लिए अदानी पर प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 5000 करोड़ रुपये का जुर्माना भी हटा दिया गया है।

मोदी सरकार क्रोनी कैपिटलिज्म का चरम प्रतीक है, और समृद्ध और शक्तिशाली लोगों द्वारा चमचागिरी पर ही फलती फूलती आयी है।

मोदी अपने चुनाव अभियान को पैसा देने वाले क्रोनियों को इतने सारे एहसान देने में व्यस्त रहे हैं, बदले में श्री अंबानी व उनके गोदी मीडिया घरानों ने, बेवजह सर पर डाली गयी भारी आर्थिक आपदा के बावजूद, मोदी द्वारा नोटबंदी के तुगलक़ी फरमान की तारीफ की थी।

यह सरकार सीवीसी और सीआईसी को कमजोर कर रही है, और 3 साल तक लोकपाल की नियुक्ति करने में विफल रही है।

“ना खाऊंगा और ना ख़ाने दूंगा” के जुमले का तो ये हाल है।

मीडिया?

नीचे ग्राफिक पर एक नज़र डालें। एक अकेली कंपनी, नेटवर्क -18 की भारत में लगभग सभी प्रमुख समाचार घरानों में हिस्सेदारी है, और श्री अंबानी नेटवर्क -18 को नियंत्रित करते हैं। जनवरी 2012 में आरआईएल ने नेटवर्क -18 कंपनी में अल्पसंख्यक हिस्सेदारी के साथ अपना पहला निवेश किया था। 29 मई 2014 को, नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधान मंत्री के रूप में शपथ दिलाई जाने के तुरंत बाद, कंपनी ने 4,000 करोड़ रुपये का भुगतान करके बहुसंख्य हिस्सेदारी हासिल कर ली । [11] [12]

कभी आपने एक वफादार कुत्ते को कभी अपने मालिकों पर भौंकते हुए देखा है?

विपक्षी दल?

जब यह पूंजीवाद के बारे में बात आती है, तो कई मुख्यधारा वाली विपक्षी पार्टियां बीजेपी से अलग नहीं हैं। भाजपा की तरह ही, ये दल भी कॉरपोरेट सेक्टर से बड़े पैमाने पर फंडिंग लेते हैं, और उनको बदले में फायदा पहुँचाकर अपना क़र्ज़ उतारते हैं। ध्यान रखें कि श्री अंबानी की कंपनी आज इस मुकाम पर इसलिए है क्योंकि यह अतीत में अलग-अलग राजनैतिक जुड़ाव की कई सरकारों से अनुकूल फैसलों का लाभ उठा चुकी है।

ऐसे कुछ दलों, जिन्होंने इस तरह के मुद्दों को उठाने की हिम्मत की है, तो उनपर श्री अंबानी द्वारा नियंत्रित मुख्यधारा मीडिया के माध्यम से हमले किए जाते हैं। हमारे कॉर्पोरेट मीडिया द्वारा वाम दलों को “राष्ट्र-विरोधी” के रूप में चित्रित किया जाता है। आम आदमी पार्टी को और भी अधिक बुरी तरह से लक्षित किया जाता है।

क्या आप सच में ये उम्मीद करते हैं कि श्रीमान अंबानी के खिलाफ आवाज उठाने के लिए विपक्ष में हिम्मत है, जबकि वो जानते हैं, कि उनके साथ क्या हो सकता है?

सिविल सोसाइटी और एनजीओ?

कई एनजीओ और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धाओं द्वारा अथक प्रयास के कारण ही 2-जी और कोयला घोटाले का पर्दाफाश हुआ गया। इनमे एनजीओ टेलीकॉम वॉचडॉग और प्रशांत भूषण की अगुवाई वाली एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन सबसे उल्लेखनीय है, वास्तव में इन्होने ही न्यायिक हस्तक्षेप का इस्तेमाल किया था, जिसने इस मुद्दे पर सीबीआई जांच को मजबूर किया था। [13]

तो ये लोग अब कहां हैं?

अब हम जानते हैं कि कुछ तो सत्तारूढ़ पार्टी के साथ बिस्तर में हैं, एलजी और मंत्री बन गए हैं, एक बाबाजी तो अब एक सफल उपभोक्ता कंपनी के सीईओ बन गए हैं, खुद ही क्रोनी पूंजीवाद का एक बड़ा लाभार्थी हैं। जाहिर है, वे पक्षपातपूर्ण थे।

दूसरे, जो अभी भी लड़ रहे हैं, उन्हें बदनाम किया जा रहा है और हमारे मीडिया द्वारा इनपर लगातार हमला किया जा रहा है। प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा श्री प्रशांत भूषण को हमारी न्यायपालिका द्वारा इस मामले समेत कई अवसरों पर रोका गया है, ये ऐसे गंभीर मुद्दे थे जो कि पहली नज़र में कम से कम एक जांच कराये जाने लायक तो थे ही। इस मामले में, हमारे माननीय न्यायाधीश ने उनसे पूछा: [14]

“प्रशांत भूषण, आपके पास एक योद्धा की छवि है। लेकिन क्या आप जनहित याचिका के लिए केंद्र बन सकते हैं? हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते।”

आमतौर पर, ऐसी टिप्पणी पर एक हाहाकार होना चाहिए था, लेकिन जब मीडिया पहले ही खरीदा जा चुका था, तो कौन इसे उठाएगा?

अंत में, याद रखें, श्री अंबानी सिर्फ 500 रुपये का भुगतान करके अपने उत्पाद के लिए देश के प्रधानमंत्री को भी मॉडल बनाने में सक्षम हैं !

यदि आप ये जानना चाहते हैं की दरअसल कौन आप पर शासन करता, तो ते पता लगाओ कि किसकी निंदा करना वर्जित है – वॉल्टेयर

सन्दर्भ

1.
Reliance and Infotel: One More Telecom Scam? 2010. The Second Take. June 19. [Source]
2.
Ghosh, Shauvik. 2014. DoT refutes CAG allegations on “undue favours” to Reliance Jio. http://www.livemint.com/. August 6. [Source]
3.
Pahwa, Nikhil. 2010. India’s Broadband Wireless Auction Ends; Operator & Circlewise Results. MediaNama. June 11. [Source]
4.
Editorial, Reuters. 2010. India’s richest man back in telecoms with Infotel. Reuters. June 11. [Source]
5.
DoT refutes CAG’s charges of favouring Reliance Jio by allowing it to convert it’s ISP permit into a unified license. 2017. The Economic Times. http://economictimes.indiatimes.com/industry/telecom/dot-refutes-cags-charges-of-favouring-reliance-jio-by-allowing-it-to-convert-its-isp-permit-into-a-unified-license/articleshow/37537848.cms. Accessed July 18.
6.
Guha Thakurta and Aditi Roy Ghatak, Paranjoy. 2016. The Immaculate Conception of Reliance Jio. The Wire. March 4. [Source]
7.
The Rs 19,000 crore mystery: How the CAG figure for “undue benefit” to Mukesh Ambani’s Reliance Jio shrank. 2015. The Caravan. May 31. [Source]
8.
Report, PTI. 2017. Reliance Jio tariff case: Attorney general favours non-intervention of Trai. http://www.livemint.com/. February 1. [Source]
9.
Gairola, Manoj. 2017. Did Mukul Rohatgi Give a Regulatory Carte Blanche to Reliance Jio? The Wire. June 14. [Source]
10.
Rathee, Kiran. 2017. DoT asks FinMin to slash telecom revenue target by 40%. Business Standard. June 19. [Source]
11.
RIL buys Network18 group for up to Rs 4,000 crore – Times of India. 2017. The Times of India. http://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/RIL-buys-Network18-group-for-up-to-Rs-4000-crore/articleshow/35754576.cms. Accessed July 18.
12.
Almost All TV Channels are controlled by Mukesh Ambani threatening Independent Journalism: P. Sainath. 2016. SabrangIndia. April 21. [Source]
13.
Chronology: How the 2G scam case UNFOLDED. 2012. rediff.com. May 14. [Source]
14.
SC to Prashant Bhushan: How can you become the centre for public interest litigation? 2017. The Economic Times. http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/sc-to-prashant-bhushan-how-can-you-become-the-centre-for-public-interest-litigation/articleshow/50557288.cms. Accessed July 18.
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