राफ़ाएल सौदे पर झूठ – दाल में कुछ काला है

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राफ़ाएल घोटाले को लेकर उठे सवालों पर सरकार द्वारा “राष्ट्रीय सुरक्षा” की आड़ में छिपना, तथ्यों को तोड़ना मरोड़ना, और सफ़ेद झूठ बोलना इस घोटाले को लेकर और भी शक़ पैदा करता है। यदि आपको पहले इस मसले पर कोई गड़बड़ नहीं भी दिख रही थी, तो अब ज़रूर शक होना चाहिए।

साफ बात  ने अक्टूबर 2016 में राफेल घोटाले का खुलासा किया था। लगभग एक साल बाद, इस मुद्दे पर विपक्ष ने गौर किया। मीडिया में प्रारंभिक ब्लैकआउट के बावजूद सवाल पूछे जाने के बाद, अंतत: सरकार ने 17 नवंबर, 2017 को रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाब देने का फैसला किया।

यदि आप कुछ वास्तविक स्पष्टीकरण की उम्मीद कर रहे थे, तो आप निराश हुए होंगे। माननीय मंत्री ने अपना “उग्र रूप” धारण किया, और गुस्से भरे हाव भाव के साथ, अपने प्रधानमंत्री द्वारा किए गए राफ़ाएल सौदे पर असली सवालों के जवाब देने के बजाय पिछली सरकारों पर हमला किया और बयानबाजी करती रहीं।

फिर भी, कम से कम उन्होंने सौदे पर हुए खर्चों का सम्पूर्ण विवरण देनेका का वादा किया था।

हमने इंतजार किया, बेसब्री से

पिछले हफ्ते देश को ये पता चला कि यह एक खोखला वादा था। राफ़ाएल घोटाले ने निश्चित रूप से एक संदिग्ध मोड़ लिया है। अगर कोई घोटाला नहीं था और कीमतों में ३ गुना वृद्धि उचित थी, तो वायदे के अनुसार ब्यौरा देने के बजाए उनके बारे में झूठ क्यों बोले जा रहे हैं?

रक्षा मंत्री का “आधिकारिक” प्रेस बयान

7 फरवरी 2018 को, सरकार ने नीचे दिए गए आधिकारिक प्रेस बयान को जारी किया। इस ब्यान में न केवल विपक्षी दलों और अन्य लोगों द्वारा उठाए गए सवालों के बारे में कोई वास्तविक ब्यौरा नहीं दिया गया है, बल्कि इसका उद्देश्य सफ़ेद झूठ बोलकर, तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश करके, भारत के लोगों को बेवकूफ़ बनाना है। चलिए हम झूठों की इस लंबी सूची पर गौर करें।

नोट करें, रक्षा मंत्री की प्रेस विज्ञप्ति में घटिया क्वालिटी की हिंदी के लिए हम नहीं, बल्कि उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया गूगल ट्रांसलेट सॉफ्टवेयर के अनुवाद हैं, हम उनकी विज्ञप्ति के अंश यहाँ शब्दशः उधृत कर रहे हैं। यह भी नोट करें, की अंग्रेजी विज्ञप्ति के आखिरी दो पैराग्राफ हिंदी विज्ञप्ति में गायब हैं, हमने झूठ संख्या ११-१२ में इनके अनुवाद का प्रयोग किया  है।

झूठ 1: “निराधार” आरोप

फ्रांस से 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए 2016 में अंतर-सरकारी समझौते (आईजीए) के बारे में तमामा आरोप लगाये जा रहे हैं। यह आम तौर पर एक प्रतिक्रिया नहीं रह गई है,  लेकिन भ्रामक वक्तव्यों के कारण इससे गंभीर क्षति भी हो रहा है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी आघात है।

तथ्य: इसी साल कतर ने फ्रांस से 12 राफ़ाएल जेट विमान को 1 अरब यूरो के आस पास में खरीदा था, मलेशिया 2 अरब डॉलर में 24 जेट्स खरीद रहा था, (इसे स्थगित किया गया) इसलिए जब हमारे माननीय प्रधान मंत्री मोदी 7.8 अरब यूरो में 36 राफ़ाएल जेट खरीदते हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी के संदिग्ध सौदे पर सवाल पूछने के लिए 4.8 अरब यूरो के आधार  हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मूल MMRCA सौदे को रद्द करने के संदिग्ध बहाने और रक्षा मंत्रालय के तथ्य-रहित प्रतिक्रियाओं (वर्तमान प्रतिक्रिया सहित) जिनमें “राष्ट्रीय सुरक्षा” का हवाला देते हुए “गोपनीयता संधि” के पीछे छिपने के प्रयास दिखाते हैं, मतलब दाल में ज़रूर कुछ काला है, राफ़ाएल सौदे की पूरी जांच की आवश्यकता है।

गंभीर भ्रष्टाचार के मामलों पर सवाल उठाने पर अब आमतौर पर जवाब भी नहीं दिया जाता? “आम तौर पर एक प्रतिक्रिया नहीं दी जाती” कहने का मतलब क्या है? क्या यह अब न्यू इंडिया में नया “नार्मल” है? जब हम भारत के उच्चतम कार्यकारी को निजी क्रोनी व्यापारी मित्र और विदेश सरकार के साथ मिलकर एक रक्षा सौदा में भारत के खजाने को खाली करते हुए देख रहे हैं, तो यह कहना की यह कोई प्रतिक्रिया के लायक भी नहीं है खुद ही “राष्ट्रीय सुरक्षा” के साथ एक क्रूर मजाक है।

खैर चलिए, अपनी सीट-बेल्ट बाँध लें, अपने हेलमेट लगा लें, पॉपकॉर्न का एक बड़ा पैक लेकर बैठ जाइये, आखिरकार सरकार सभी सवालों को शांत कर देने के लिए कुछ विवरण प्रदान करने जा रही है। आखिरकार!

झूठ 2: एनडीए सरकार ने 2002 में पहल की

हमें यह याद रखना चाहिए कि यह केंद्र की पिछली सरकार के दस साल के कार्यकाल के तहत भारतीय वायु सेना (आईएएफ) की आवश्यक ताकत को पूरा करने के लिए 2002 में में इसकी परिकल्पना की गई थी। 2012 में तत्कालीन रक्षा मंत्री ने स्थाई संस्थागत प्रक्रिया पर अभूतपूर्व व्यक्तिगत वीटो का इस्तेमाल किया था, जिसके चलते वह 126 मध्यम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) की खरीद की प्रकिया की शुरूआत हुई थी। यह तभी संभव हो पाया जब आईएएफ की लड़ाकू क्षमता में गिरावट आई थी।

तथ्य: एनडीए सरकार ने MMRCA के लिए IAF से अनुरोध प्राप्त करने के अलावा बिल्कुल कुछ नहीं किया। इसपर पूरा काम यूपीए सरकार ने किया था, अंततः 2007 में RFP (टेंडर) निकाला गया। इसपर वायुसेना द्वारा तकनीकी मूल्यांकन की एक लंबी प्रक्रिया चली, जिसे 2011 तक पूरा किया गया था, और अंत में 2012 में निम्नतम बोली वाले विक्रेता को निर्धारित किया जा सका था।

झूठ 3: अपने पूर्वाधिकारी के मत्थे दोष मढ़ दें

2012 में तत्कालीन रक्षा मंत्री ने स्थाई संस्थागत प्रक्रिया पर अभूतपूर्व व्यक्तिगत वीटो का इस्तेमाल किया था, जिसके चलते वह 126 मध्यम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) की खरीद की प्रकिया की शुरूआत हुई थी। यह तभी संभव हो पाया जब आईएएफ की लड़ाकू क्षमता में गिरावट आई थी।

तथ्य: MMRCA सौदे में दुसरे विकल्प यूरोफाईटर टाइफून की तुलना में, दसॉ (Dassault) को सबसे कम (L1) बोली घोषित करने के बाद, कई भाजपा सांसदों ने दसॉ की बोली और उसके दाम के बारे में सवाल उठाए थे, की यह सबसे कम नहीं था। भूतपूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने इन सांसदों को राष्ट्र विरोधी घोषित करने के बजाय, उनकी आपत्तियों को संज्ञान में लिया और राफ़ाएल फाइल पर एक नोट डाला, जिसने अधिकारियों से अंतिम बातचीत करके कीमत की पुष्टि करने के लिए कहा, ताकि यह सुनिश्चित रहे की कीमत सबसे कम बनी रहे। वर्तमान रक्षा मंत्री जानबूझकर इस कदम को “वीटो” के रूप में पेश करते हुए लोगों को गुमराह कर रहीं हैं।

यह नवंबर प्रेस वक्तव्य को दोहराने की तरह लगता है, वास्तव में सवालों का जवाब देने के बजाय, पिछली सरकार पर आरोप लगाने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन, हमारे पाठकों को कम से कम यह जानना चाहिए कि वर्तमान रक्षा मंत्री अपने पूर्वाधिकारी पर आखिर इलज़ाम किस बात पर लगा रही हैं।

झूठ 4: खुद तथ्यों को तोड़ें-मरोड़ें, और उल्टा इलज़ाम दूसरों पर मढ़ें

तथ्यों को तोड़-मरोड़ करने के एक अन्य प्रयास में, सरकार से पूछा गया है कि वह किसी प्रतिस्पर्धी लड़ाकू विमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक विशेष कंपनी के साथ वार्ता क्यों नहीं करता है। ऐसा लगता है कि कि तत्कालीन सरकार ने स्वयं ही बोली प्रक्रिया बंद होने के बाद कंपनी की अवांछित पेशकश को खारिज कर दिया था, जिसे वह आसानी से यह भूल गया था,  उन्होंने राफेल (डीए) को एल 1 बिडर घोषित कर दिया था और फरवरी 2012 में इसके साथ बात-चीत की शुरूआत की थी।

तथ्य: सरकार दो अलग सौदों को एक दूसरे में मिलाकर जनता को बेवकूफ़ बना रही है।

आइये हम इसे समझें। जब मूल MMRCA सौदे की बातचीत चल रही थी, युरोफाइटर ने यूपीए सरकार को स्वयंभी अन्य एक पेशकश की, जिसे यूपीए सरकार ने खारिज कर दिया, जो की DPP की शर्तों के अनुसार सही था, क्योंकि उस समय तक अभी भी न्यूनतम बोली वाली कम्पनी से बातचीत जारी थी।

दूसरी तरफ, मोदी सरकार ने MMRCA के पूरे सौदे (१२६ विमान, जिनमे से १८ बने बनाये खरीदे जाने थे, बाकी १०८ भारत में बनाये जाने थे) को अचानक ही खत्म कर दिया और एक नया सौदा करने के लिए मनमाने ढंग से इसे पूरी तरह से बदलने का फैसला किया (३६ बने बनाये खरीदने)। यह देखते हुए कि यह एक बिल्कुल नया सौदा है – तो क्या ताजा निविदाएं आमंत्रित नहीं करनी चाहियें थीं ? जब पूरा सौदा ही बदला जा रहा था, तो क्या उसे कम से कम दूसरे विकल्प, L2 बोली देने वाली कम्पनी से एक नए प्रस्ताव की मांग नहीं करनी चाहिए? यह सवाल पूछने में क्या गलत है? क्या यह संभव नहीं है कि यूरोफाइटर, जिसे वायुसेना ने तकनीकी परीक्षणों में समान रूप से अच्छा माना था, शायद 36 विमानों के लिए बेहतर बोली दे सकता था?

मोदी सरकार कह रही है, चूंकि यूरोफायटर एक सौदे को खो चुके हैं और UPA ने प्रक्रिया के अनुसार उसी सौदे के लिए यूरोफायटर की पेशकश को खारिज कर दिया था, अब हम उन्हें भविष्य की किसी भी निविदा में हमेशा के लिए नहीं मानेंगे। यदि यूरोफाइटर रफेल की आधी कीमत पर अपने जेट प्रदान करता है तो क्या होगा?

इससे अधिक चिंताजनक बात यह है कि भारत के रक्षा मंत्री के पास इस सवाल के लिए इस दयनीय झूठी तुलना से बेहतर कोई जवाब क्यों नहीं है? जब भी कोई भी प्रधान मंत्री मोदी के संदिग्ध आचरण को लेकर सवाल करता है, तो भारत सरकार का रटा रटाया जवाब यही होता है, कि “कांग्रेस ने भी ऐसा किया था” – भूल जाइये की भले ही इसके पीछे पूरी तरह से अलग परिस्थितियाँ रहीं हों । क्या मोदी यूपीए के रस्ते पर चलने की कोशिश कर रहे हैं और वो ईमानदारी से नक़ल करने में भी नाकाम हो रहे हैं?

झूठ 5: अब यह एक बेकार मांग है, जब हमने की थी, तब यह बेकार मांग नहीं थी

यह मांग की जा रही है कि इस अनुबंध से संबंधित विवरण और मूल्य का खुलासा सरकार करे लेकिन सरकार ने इसे अवास्तविक करार देकर नकार दिया है।(इससे पहले भी गोपनीयता की आवश्यकताओं के अनुरूप को ध्यान में रखते हुए, यूपीए सरकार ने विभिन्न रक्षा खरीदों की कीमत का खुलासा करने में असमर्थता व्यक्त की थी, जिसका उत्तर संसद प्रश्नों में भी समाहित है)

तथ्य: इसी पैराग्राफ़ के दूसरे वाक्य से हमें पता चलता है कि विपक्ष द्वारा ऐसी मांगें पहले भी की गईं, जब यूपीए सत्ता में थी, तो  फिर यह एक बेकार मांग कैसे हो गयी?

यह दावा कि “UPA सरकार ने भी कीमत नहीं बताई थी”, भी गुमराह करने की कोशिश है। भाजपा के प्रोपगैंडा ने UPA के कुछ मामलों को चुन लिया है, जब लागत का उल्लेख नहीं किया गया था, जैसे कि यही “सामान्य प्रक्रिया” रही हो, जबकि ऐसे पर्याप्त उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि संसद में हथियारों पर हुए खर्च को बताया गया है, जिसमें 2013 में खुद फ्रांस के साथ मिराज अपग्रेड सौदे में खर्च की गई लागत भी शामिल है।

झूठ 6: राष्ट्रीय सुरक्षा का लंगोट

राफेल एयरक्राफ्ट डील से संबंधित अनुमानित अधिग्रहण लागत के बार में पहले ही संसद को अवगत कराया जा चुका है। जैसा की मांग किया जा रहा है कि इस डील से संबंधित आइटम-वार लागत और अन्य जानकारी भी उफलब्ध कराई जाए, इस बारे में सरकार ने अपना रूख स्पष्ट करते हुए कहा है कि इससे हमारी सैन्य तैयारियों और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करेगा।

तथ्य: बस लागत के ब्रेक-अप को माँगा गया है, न कि परमाणु मिसाइलों के लांच-कोड। हम गणतंत्र दिवस पर हमारी अपनी हथियार प्रणालियों को प्रदर्शित करते हैं, वैसे ही फ्रांस भी ये करता है। इसलिए हर देश जानता है कि राफ़ाएल क्या कर सकते हैं और इनमें कौन से हथियारों को लगाया जा सकता है। दसॉ स्वयं राफ़ाएल को खरीदने के इच्छुक किसी भी देश को पूरी सूचना देता है, जिसे आप भी स्वयं उसकी वेबसाइट पर जाकर किसी भी वक़्त देख सकते हैं।

यह दिलचस्प है कि भारत सरकार ने दावा किया कि राफ़ाएल भारत के लिए “विशेष हथियार प्रणालियों को डिज़ाइन” करने जा रहे हैं। हमें इस दावे पर नज़र रखनी होगी। फिलहाल तो, यह पूरी तरह से एक जुमला ही लगता है।

क्या यह सच नहीं है कि लगभग 12,000 करोड़ रुपए के इन कस्टमाइजेशन मुख्य रूप से हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले सिस्टम (HMDS) से सम्बंधित है, जो कि श्री गौतम अदानी के भागीदार एलबिट से ख़रीदे जा रहे है?

झूठ 7: 2008 का “टॉप सीक्रेट” समझौता

इस तरह के विवरण 2008 में हस्ताक्षरित सुरक्षा समझौते के दायरे के तहत भी आएंगे। इसी कारण से अनुबंध के मद-वार विवरण का खुलासा नहीं कर रहे हैं, सरकार केवल पिछली सरकार द्वारा हस्ताक्षरित 2008 के द्विपक्षीय भारत-फ्रांस समझौते के गोपनीय प्रावधानों के पत्र और भावना का ही सम्मान कर रही है।

तथ्य: अभी नवंबर में भारत के रक्षा मंत्री ने खुद ही राफ़ाएल सौदे के विस्तृत ब्यौरे का खुलासा करने का वादा किया था। क्या यह “गोपनीयता समझौता” एक इतना बड़ा और गोपनीय रहस्य था कि स्वयं देश के केंद्रीय रक्षा मंत्री – जो कि कैबिनेट के एक बहुत वरिष्ठ सदस्य भी होते हैं – भी इसके बारे में दो माह पहले तक अनजान थे?

यह थोड़ा अजीब लगता है कि 2008 में, जब MMRCA RFP के छह विमानों का अभी भी मूल्यांकन किया जा रहा था, और कोई नहीं जानता था कि भारतीय वायुसेना फ्रांस के राफ़ाएल का चयन करेगी, भारत सरकार ने पहले से फ्रांस के साथ एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो अब 8 साल बाद 2016 में किये गए एक समझौते के बारे में गोपनीयता को भी शामिल करता है।

रक्षा मंत्री ने स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताया है कि आखिर वो फ्रांस के साथ 2008 में किये ऐसे कौन से समझौते का हवाला दे रहीं हैं, जिसने 2016 में किए गए राफ़ाएल सौदे को भी पूरी तरह से गोपनीय प्रदान कर डाली है? इस लेख को देखें जिसमे कि 2008 के दौरान फ्रांस और भारत के बीच किये गए सभी समझौतों के विवरण शामिल हैं। ऐसा लगता नहीं है कि इनमें से कोई भी इस सूचना को जारी करने से सरकार को प्रतिबंधित करता है।

झूठ 8: हमारा सौदा बेहतर है क्योंकि हम ऐसा कहते हैं – पर विवरण नहीं बताएँगे

चूंकि 36 विमानों के लिए 2016 अनुबंध के बारे में संदेह पैदा होने जैसा मांग की जा रही है,सरकार ने यह एक बार फिर से इसे जोरदार रूप से दोहराया है कि सरकार द्वारा सुरक्षित सौदा क्षमता, मूल्य, उपकरण, वितरण, रखरखाव, प्रशिक्षण जैसे मामलों में बेहतर है। पि।ली सरकार ने किन कारणों से इसे दस वर्षों में भी पूरा नहीं किया।

तथ्य: राफ़ाएल विमान वही हैं, पर सौदे के दाम (500 बनाम 1500 करोड़), ऑफसेट (HAL द्वारा भारत में मैन्युफैक्चरिंग, अंबानी से नहीं ), डिलिवरी (2018 बनाम 2019), रखरखाव (5 साल बनाम 20 साल) प्रशिक्षण (दोनों में समान) के मामले में वर्तमान सौदा मूल MMRCA सौदे की तुलना में बेकार है। इसके अलावा, वर्तमान सौदे में सम्पूर्ण टेक्नोलॉजी हस्तांतरण शामिल नहीं है, जो मूल RFP के मुख्य उद्देश्यों में से एक था।

इसके अलावा, मूल सौदे में 50% ऑफसेट रीइन्वेस्टमेंट से लाभ HAL को मिलना था, नए सौदे में मोदी ने ऑफसेट पार्टनर का चयन करने के लिए फ़्रांस-दसॉ को आजादी दी है। और आश्चर्य की बात है, दसॉ अंबानी का चयन करने के लिए इस स्वतंत्रता का उपयोग करता है। प्रधान मंत्री मोदी जी, दासॉल्ट को ऐसी स्वतंत्रता क्यों दें रहे हैं, जब आपके “अद्भुत बातचीत कौशल” से दसॉ को HAL का चयन करने के लिए बाध्य किया जा सकता था – जिसके साथ उन्होंने काम बांटने पर सहमति व्यक्त की थी?

यह हास्यप्रद है कि रक्षा मंत्री पिछली सरकार पर दस वर्षों में भी मूल MMRCA सौदा पूरा नहीं कर पाने का आरोप लगा रहीं हैं, जबकि अगले ही पैराग्राफ में रक्षा मंत्री कहते हैं, “2009-10 के दौरान IAF द्वारा पहले से ही विमान का मूल्यांकन किया जा चुका है”। UPA ने 2012 में राफ़ाएल की न्यूनतम (L1) बोली लगाने वाले की घोषणा की थी। इसलिए उन्होंने सिर्फ 2 साल ही लगाए, ना कि 10 साल। और यह कहना कि इससे पहले सरकार इस समझौते को पूरा नहीं कर सकी, जब समझौते को पूरा करने की बजाय मोदी ने खुद इसे खत्म कर दिया! ऐसा छिछोरापन भारत सरकार को शोभा नहीं देता है!

भाजपा के पिछले रक्षा मंत्री श्री पर्रीकर ने दावा किया था कि पुराने सौदे में प्रति विमान कीमत लगभग 700 करोड़ रूपए हो गयी थी। अब हम प्रति विमान करीब 1600 करोड़ रुपये दे रहे हैं। लेकिन कोई बात नहीं मित्रों, प्यारे करदाताओं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा है, हम आपको नहीं बताएंगे कि आपकी कड़ी मेहनत वाले टैक्स और जी एस टी का पैसा श्री अंबानी को अमीर बनाने के लिए दिया जा रहा है, ताकि वह हमारे चुनाव खर्च में कुछ योगदान दे सकें।

झूठ 9: सौदे पर लगा समय

जबकि वर्तमान सरकार ने सिर्फ एक वर्ष में इसे बात-चीत से अंजाम तक पहुंचा दिया है।

तथ्य: इस सरकार ने सत्ता में आने के लगभग 2.5 साल बाद सितंबर 2016 में समझौते पर हस्ताक्षर किए। क्या रक्षा मंत्री इस प्रेस विज्ञप्ति में दावा कर रहीं हैं कि समझौता पहले से ही अप्रैल 2015 तक हो चुका था? घोटाले तेज़ गति से होते हैं, सौदा धीमा होता है।

झूठ 10: हमें पूरा विश्वास है कि हमने नियमों का पालन किया है, और इसीलिए हम इसे गुप्त रखते हैं

एक बार फिर जोर दिया गया है कि आईएएफ की जरूरत को पूरा करने के लिए फ्रांस के साथ अंतर-सरकारी समझौते (आईजीए) के माध्यम से 36 राफेल विमानों की खरीद में रक्षा प्रोक्योरमेंट प्रक्रिया के अनुसार सभी पहलुओं में अनिवार्य, संचालन और निगरानी सहित सभी मुद्दों का ध्यान रखकर किया गया है और आईजीए में प्रवेश करने से पहले सभी आवश्यक मंजूरी जैसे सुरक्षा पर मंत्रिमंडल समिति (सीसीएस) तक की ले ली गई थी। 2009-10 के दौरान आईएएफ द्वारा विमान का सफलतापूर्वक मूल्यांकन भी किया जा चुका था।

रक्षा खरीद प्रक्रिया 2013 में अंतर-सरकारी समझौते (IGA) मार्ग कब लिया जा सकता इसके लिए विधिपूर्वक दिशानिर्देश दिए गए हैं।

  • संयुक्त अभ्यास में पहचान
  • बड़े मूल्य का हथियार जो एक मित्र देश में सेवा में था (सेकंड हैण्ड)
  • जब किसी अत्याधुनिक उपकरण को बेचने पर उसके निर्माता के देश से प्रतिबंध हों
  • एक दीर्घकालिक समर्थन अनुबंध

इनमे से कौनसा रफेल के लिए लागू होता है? किस आधार पर अंतर-सरकारी समझौते का रास्ता चुना गया?

जब अप्रैल 2015 में मोदी पेरिस के लिए रवाना हो रहे थे, तो विदेश-सचिव एस जयशंकर ने प्रेस को बताया था कि

“रफेल के संदर्भ में, मेरी समझ यह है कि फ़्रैंच कंपनी, हमारे रक्षा मंत्रालय, एचएएल-जो इस में शामिल है, के बीच विचार-विमर्श चल रहे हैं । ये चर्चाएं चल रही हैं और ये बहुत ही तकनीकी, विस्तृत चर्चाएं हैं। हम नेतृत्व स्तर की यात्राओं में जारी रक्षा अनुबंधों के गहरे ब्योरे के साथ नहीं मिलाया करते। यह एक अलग ट्रैक पर है”

नए सौदे की घोषणा के बाद भी, तत्कालीन रक्षा मंत्री पर्रिकर को इसके बारे में पूरी तरह से पता नहीं था, उन्होंने प्रेस को बताया कि यह मोदी के फैसले थे। उन्होंने अप्रैल 2015 में प्रेस को इंटरव्यू दिया, जिसमे उनकी बातों से लगा कि यह मात्र मूल सौदे में उल्लेखित “बने बनाये” 18 के बजाए 36 जेट खरीदने का फैसला था, और शेष 90 विमान की अभी भी ज़रूरत थी ।

और आप चाहते हैं कि हम सरकार के इस दावे पर भरोसा करें कि सभी हितधारकों से परामर्श किया गया, सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया, जब मोदी ने अचानक मनमाने ढंग से सौदे को पूरी तरह बदल दिया?

Lie 11: अपने पूर्वाधिकारी को दोष दें (एक बार फिर से)

यह भी ध्यान दिया जा सकता है कि विपक्ष द्वारा बनाई जाने वाली धारणा के विपरीत, राफेल की खरीद के पहले के प्रस्ताव में, जो गतिरोध में समाप्त हो गया था, प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं था, बल्कि लाइसेंस के तहत विनिर्माण के लिए कोई प्रावधान नहीं था। सरकार शर्तों के साथ भी सहमत नहीं हो सकती थी, इसके साथ ही विक्रेता के साथ अपनी वार्ता में, जिसके परिणामस्वरूप पहले सरकार के तहत लंबे समय से चलने वाला अभ्यास अंततः व्यर्थ हो गया।

तथ्य: वर्तमान सरकार सत्ता में आने के बाद भारत में HAL में 108 विमान बनाने के लिए पुराने सौदा पर बातचीत, जिसमें प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण शामिल था, समाप्त हुई। मोदी के फ्रांस यात्रा से एक महीने पहले ही, दसॉ ने खुद स्वीकार किया था कि HAL के साथ काम-हिस्सेदारी समझौते को पूरा किया गया था। लेकिन कोई बात नहीं मित्रों, चलिए बचाव में और कुछ कहने को नहीं है, तो हम अभी भी अपने पूर्वाधिकारी को ही दोषी ठहराते हैं।

Lie 12: बस झूठ बोल दो, आखिर कौन सा आजकल पत्रकार सरकारी प्रेस विज्ञप्ति को जांचते हैं?

इसके अलावा, 36 राफेल एयरक्राफ्ट के लिए 2016 डील के लिए कोई भारतीय ऑफ़सेट पार्टनर का अब तक विक्रेता (डीए) द्वारा चयन नहीं किया गया है क्योंकि लागू दिशानिर्देशों के अनुसार, डीए भारतीय ऑफसेट पार्टनर्स का चयन करने के लिए स्वतंत्र है और मांग के समय उनके विवरण प्रदान करता है ऑफ़सेट क्रेडिट, या ऑफ़सेट दायित्व के निर्वहन के एक वर्ष पूर्व।

तथ्य: ठीक है, तो यानी की माननीय रक्षा मंत्री को अपने इतने बड़े सप्प्लायर के उस संयुक्त उद्यम के बारे में पता नहीं है जो कि अक्टूबर 2017 में दसॉ एविएशन (DA) और श्री अंबानी के बीच पहले ही हो चुका हैं। 27 अक्टूबर, 2017 को दसॉ से इस प्रेस विज्ञप्ति को देखें।

तो, इस सफ़ेद झूठ के पर्दाफाश होने के बाद, आप अभी भी रक्षा मंत्री पर कितना विश्वास करते हैं? राफेल डील पर सरकार के बयानों पर हम कितना भरोसा करे सकते हैं?

गोपनीयता का बहाना

पूरी दुनिया को पता है कि हम राफ़ाएल का किस प्रकार का विमान खरीद रहे हैं। कोई भी दसॉ एविएशन की वेबसाइट पर जा सकता है, और रफेल के एफ 3 आर मानक के संगत हथियारों को देख सकता है।

जब सौदा घोषित किया गया था तब सभी मीडिया घराने डंका बजा रहे थे, जिसमें हथियारों के बारे में विवरण शामिल थे।

आपको याद होगा, जब मोदी द्वारा किये सौदे की कीमत के बारे में पहली बार सवाल उठाया गया था, तब खुद भाजपा आईटी सेल द्वारा स्कैल्प तथा मेट्योर बी वी आर मिसाइलों और थेल्स रडार आदि के बारे में भरपूर प्रचार किया गया था, और इनके द्वारा कीमत की वृद्धि को उचित ठहराया गया था। उसके नेताओं, राज्यवर्धन राठौर और पीयूष गोयल जैसे केंद्रीय मंत्रियों ने भी इनको ट्वीट किया था। पूर्व रक्षा मंत्री पर्रीकर ने हेलमेट माउंट डिस्प्ले सिस्टम की क्षमताओं के बारे में एक साक्षात्कार दिया।

एक नमूना नीचे पेश है:

और अब, हथियारों के बारे में खुद ही डंका बजा देने के बाद, हमें बताया जा रहा है कि यह एक गुप्त रहस्य है, और इसका विवरण साझा नहीं किया जा सकता है?

हमारे दुश्मन खुद अंतरराष्ट्रीय बाजार से हथियार खरीदते हैं। वे हथियारों के विशिष्ट मॉडलों को भली भांति जानते हैं जो राफ़ाएल के साथ लगाए जा सकते हैं, और हमारे भाजपा प्रॉपैगांडा द्वारा डंका बजाए जाने की कृपा से, उन्हें यह भी पता है कि हम कौन से हथियार खरीद रहे हैं। वे यह भी भली भांति जानते हैं कि इन्हें किस दाम में खरीदा जा सकता है।

तो यह गोपनीयता किससे है? सिर्फ भारतीय जनता और भारतीय संसद से?

अभी हाल में ही, मैंने अपने एक मोदी-भक्त मित्र को भाजपा के आईटी सेल प्रोपगैंडा वेबसाइट पोस्टकार्ड न्यूज से, जो अक्सर सभी भक्तगणों के ज्ञान का स्त्रोत होता है, इन दोनों लेखों को शेयर करते देखा। मजेदार बात है कि ये दोनों ही एक ही दिन प्रकाशित हुए, और इन्हें भक्तों द्वारा सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से शेयर किया गया, जो स्वयं इनमे किसी भी प्रकार का परस्पर विरोधाभास को देखे बिना इसे फैला रहे हैं। एक तरफ आप किसी व्यक्ति को सरकार से रफायल के ब्योरे पूछने के लिए उसे दोष दे रहे हैं, और फिर दूसरी तरफ तथाकथित रूप से रक्षा मंत्रालय के “विश्वस्त सूत्रों” द्वारा लीक किये गए, इस सौदे से जुड़े ब्योरे आप खुद ही फैला रहे हैं, और फिर भी उस व्यक्ति पर हमला कर रहे हैं, है जो इसे मांग रहा था।

आप सोचेंगे कि यह मूर्खतापूर्ण रवैया सिर्फ कुछ भाजपा आईटी सेल वेबसाइट तक सीमित है। लेकिन ध्यान से सोचें, क्या मुख्यधारा के गोदी मीडिया चैनलों – ज़ी न्यूज़, इण्डिया टीवी, टाइम्स नाउ और रिपब्लिक आदि ने भी वास्तव में ऐसा ही नहीं किया है? सरकार से सख्त सवाल पूछने के बजाय, उन्होंने स्पष्ट रूप से उसकी “गोपनीयता” तर्क का बचाव किया है, और फिर कभी-कभी स्वयं ही “विश्वस्त सूत्रों” आधारित कहानियों का खुलासा किया है?

आपने मोदी के भाषणों में अक्सर उन्हें कांग्रेस को 70 साल तक जो कुछ भी हुआ, उसके लिए दोषी ठहराते हुए सुनते हैं, और उसके बाद भी हर बात पर, ज्यादातर मुद्दों पर, इस सरकार के पास केवल एक ही बहाना होता है, “कांग्रेस ने भी तो ऐसा ही किया था”। एक बार फिर, आप पाएंगे की मोदी भक्त और गोदी मीडिया उत्साहपूर्वक दोनों ही परस्पर विरोधी बातों को फैला रहे हैं। इनका विरोधाभास उनके दिमाग में नहीं घुस पाता है।

भक्तों को अच्छी तरह से ब्रेनवॉश कर दिया गया है। मुख्यधारा का मीडिया भी काफी हद तक सरकार के चाटुकार पत्रकारों के जरिए बे-असर हो चूका है। वे कभी भी मोदी सरकार से कोई भी सवाल नहीं कर रहे हैं, जो सिर्फ चीयरलीडर के रूप में कार्य करते हैं। वे सरकार के हर कदम की अंधभक्ति में वाहवाही करते रहेंगे, सरकार कितने भी गलत कदम उठा लें, चुप बैठे रहेंगें, कुछ नहीं करने वाले, कोई सवाल नहीं उठाने वाले।

पर क्या आप भी चुपचाप बैठे रहेंगे, सवाल नहीं करेंगे?

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