भक्ति – लक्षण, इतिहास, फैलाव और उपचार

 

 

भक्ति के रोग पर एक एक चिकित्सा गाइड जो इसकी उत्पत्ति, फैलने के ज़रिये, लक्षण, निदान और उसके उपचार के तरीकों का विश्लेषण करती है

लक्षण

आप एक रिश्तेदार, या अपने कॉलेज के एक दोस्त से, कई वर्षों के बाद मिलते हैं। चर्चा किसी तरह से भारतीय राजनीति पर पहुँच जाती है। आप कुछ मुद्दों पर वर्तमान मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं, वह अचानक बहुत आक्रामक हो जाता है। “आप भारत के प्रधानमंत्री का अपमान कैसे कर सकते हैं? अगर आप प्रधानमंत्री का सम्मान नहीं कर सकते हैं, तो आप भारत का सम्मान कैसे कर सकते हैं?” वह गुस्से में आपसे पूछता है।

आप चुपचाप याद करते हैं कि कैसे, पिछली बार जब आप दोनो की मुलाकात हुई थी, यही इंसान खुद के पिछले प्रधानमंत्री को चुन-चुन के गालियां दे रहा था

वह आपके द्वारा 2002 में मोदी के दागी रिकार्ड को अप्रासंगिक पुरानी खबर बताते हुए खुद अतीत की तरफ “फ़ास्ट रिवाइंड” करने लग जाता है – “1984 में क्या हुआ?” “जब कश्मीरी पंडितों को निकाला जा रहा था तब तुम कहाँ थे?”, वो आपको बताने लगता है की किस तरह आधुनिक भारत में जो कुछ भी गलत है, उसके लिए नेहरू, मुगल और दिल्ली सल्तनत दोषी हैं; कैसे गांधीजी धूर्त थे, कैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों प्राचीन भारत की उपलब्धियों को विकृत कर दिया है, क्यों बुद्धिजीवियों गलत कर रहे हैं, क्यों धर्मनिरपेक्षता भारत के लिए एक बुरी चीज़ है ।

कुछ जाना पहचाना सा लगा?

सबसे पहले, इससे पहले कि आप अपने दोस्त की स्थिति के बारे में ज्यादा चिंतित हों, घबराइये मत, आपका सामना एक “भक्त” से हो गया है।

भक्त (संज्ञा): यह मूलतः एक संस्कृत शब्द है जिसका प्रयोग हिंदी समेत कई आधुनिक भारतीय भाषाओं में किया जाता है.  भक्त एक श्रद्धालु व्यक्ति है जो किसी गुरु पर बहुत विश्वास और भरोसा रखता है, उसे बहुत मानता है। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में, भक्त शब्द का प्रयोग अब श्री नरेंद्र मोदी के उन कट्टर समर्थकों के लिए किया जाता है, जो मोदी के हर कदम का अंधाधुंध समर्थन करते हैं। इन्हें अक्सर पुराने हिन्दू राजाओं का समय पसंद है, और अक्सर ये हिंदुओं के खिलाफ धोखा होने के कई षड्यंत्र भरी कांस्पीरेसी थ्योरी को पसंद करते हैं – वे अक्सर इस तरह की कहानियों ऑनलाइन सोशल मीडिया पर शेयर भी करते हैं।

समझ लीजिये की जिस प्रकार एक कोढ़ी कुष्ठ रोग के इन्फेक्शन(संक्रमण) का शिकार है, एक भक्त को भी भक्ति नामक इन्फेक्शन हो गया है।

निदान/जांच

जैसा कि पहले उल्लेख किया है, भक्तों की प्रमुख विशेषता यह है कि वे श्री नरेन्द्र मोदी के बचाव में बेहद रक्षात्मक हो जाते हैं ।

उनकी पहचान करने के लिए एक साधारण परीक्षण किया जा सकता है।
एक सम्भावित भक्त के सामने बस मजाक में “मोदी बहुत बड़ा मूर्ख है” की तरह कुछ अपमानजनक कह कर देखिये।
अगर इसके परिणाम में आपको निम्नलिखित प्रतिक्रियाओं में से एक देखने को मिलती है,
  1. व्यक्ति पूरी तरह से चुप हो जाता है, और आप महसूस कर सकते हैं कि वह काफी गुस्से में है।
  2. व्यक्ति बहुत रक्षात्मक हो जाता है, आपसे सवाल करने लगता है कि आखिर आपने मोदी के बारे में ऐसा क्यों कहा, आपको मोदी के बारे में कुछ सामान्य अफवाहें सुनाने लगता है (वे कितनी ज्यादा मेहनत करते हैं, कितना सादगी भरा इंसान है वो आदि)
  3. व्यक्ति या तो आप को, या फिर किसी अन्य दलों के कुछ नेताओं को जोरों से कोसना शुरू कर देता है (इस विषय पर लेखक के अपने कई प्रयोगों में आम तौर पर इनके निशाने पर आम आदमी पार्टी के नेता श्री अरविंद केजरीवाल या फिर कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी होते हैं )

तो, भक्ति के इन्फेक्शन(संक्रमण) की पुष्टि होती है।

आम तौर पर, एक भक्त में स्वतंत्र सोच का अभाव होता है और वह किसी भी बहस में उसकी बातें एक ही ढर्रे पर चलती हैं।

उत्पत्ति/प्रबलता

हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि भक्ति का इन्फेक्शन मूल रूप से भेड़ों से मनुष्य के अंदर पहुंच है, विद्वानों में मान्य आम सहमति ये है कि भक्ति ने  भारत के पश्चिमी क्षेत्र में 2002 में जन्म लिया था, मुख्य रूप से गुजरात राज्य में । हमारे पास इसके पहले रोगी पर कोई निश्चित जानकारी नहीं है, पर हम ये ज़रूर निश्चित रूप से दावा कर सकते हैं कि, शुरू में, ये इन्फेक्शन भाजपा / आरएसएस के कुछ कार्यकर्ताओं में ही सीमित था, इसके बाद एक महामारी की तरह इसे जनता के बीच व्यापक पैमाने पर फैलाया गया। इन दिनों, वे भारत के “काऊ-बेल्ट” राज्यों में सबसे अधिक प्रचलित हैं, और अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में कुछ गुजराती / उत्तर भारतीय समुदायों में भी फ़ैल चुका है।

मूल भक्त कट्टरवादी हिंदू थे, विशेष रूप से गुजरात के। गुजरात में 2002 के दंगों के बाद, मीडिया के एक बड़े वर्ग के द्वारा, मुख्यमंत्री मोदी (जो उस समय एक अपेक्षाकृत अज्ञात नेता थे) के नेतृत्व में गुजरात सरकार की असफलताओं को नियमित रूप से उजागर किया गया था। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म का पालन का उपदेश दे डाला था, और वो भी मोदी को बर्खास्त करना चाहते थे।

पर, आजीवन प्रचारक रह चुके श्री मोदी के पीछे आरएसएस का समर्थन था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रोपगैंडा मशीनरी को फुल-स्पीड पर चलाया गया, और छवि बदलाव के लिए एक ऐसी कहानी को अंजाम दिया गया जिसने अंत में हिन्दू धर्मांध की कल्पना को सच्चाई से भी अधिक प्रभावित कर डाला। यह उस प्रक्रिया की एक प्रारंभिक अभिव्यक्ति थी जिसे अब लोग “सत्योत्तर (पोस्ट-ट्रुथ) संसार” के नाम से जानते हैं। इस दुनिया में, सत्य और न्याय प्रासंगिक नहीं रह  जाते हैं, रणनीतिक तरीके से भड़काई गयी भावनायें अधिक महत्वपूर्ण हैं।

यह ऐसा पहला मौका भी था, जब मोदी ने उनपर हो रही आलोचना से बड़ी छल के साथ दूसरों पर थोप देने की रणनीति को सफलतापूर्वक अपनाया था, जिस पर दुसरे लोग फिर मोदी में बचाव में आगे कूद पड़े।

मीडिया ने हमला श्री मोदी और उनकी गुजरात सरकार पर किया था –  दंगों की अयोग्य नियंत्रण के लिए, जिसकी वजह से कई नरसंहार पुलिस की आँखों के सामने हुए थे।

श्री मोदी  “गुजरात गौरव यात्रा” पर निकल पड़े। वैसे तो मीडिया ने सिर्फ खुद मोदी, और उनकी गुजरात सरकार पर उनके द्वारा दंगों को ना संभाल पाने पर सवाल उठाये थे, पर श्री मोदी ने इस आलोचना को गुजरात की ‘अस्मिता’ (सम्मान) पर एक हमला करार कर दिया। गुजरातियों को एक भड़काऊ वीडियो सीडी वितरित किए गए, जिसमे गोधरा में मारे गए लोगों के ज्वलंत चित्र थे, गलत तरीके से ये विश्वास पैदा किया गया कि किसी भी बदले की “प्रतिक्रिया” उचित थी, और “धर्मनिरपेक्ष” प्रेस मोदी प्रशासन का नेतृत्व की नहीं, बल्कि गुजरात की सारी 5 करोड़ जनता की आलोचना कर रहा था। हालांकि ये तो आलोचना पर अपनी जिम्मेदारी से भागने की एक बचकानी रणनीति थी, गुजराती हिंदुओं की एक बड़ी संख्या इस झांसे में आ गयी। इसकी क्या वजह थी, क्या यह उनके अपराध-बोध से लड़ने के लिए एक मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र था, ये सब वर्तमान लेख के दायरे से परे है, और हम शायद कभी नहीं जान पाएंगे। लेकिन हम ये ज़रूर जानते हैं कि यह भोंडी और हास्यास्पद रणनीति वास्तव में सफल हो गयी। कई लोग अपने ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के बचाव में, और “सेक्युलर” लोगों – जो उनकी नज़र में गुजरात की छवि खराब कर रहे थे, – के विरोध में उठ खड़े हुए । बस फिर क्या था, मोदी भक्त का जन्म हुआ ![1]

मोदी और उनके भक्त आज भी इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। जब आप मोदी की आलोचना करेंगे, इसे उनके द्वारा तोड़ मड़ोड़ कर भारत की आलोचना के रूप में  दर्शाया जाता है, और उनके प्रोपगैंडा के द्वारा आपको एक राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिया जाता है। ये तो मानसिक स्तर है मोदी के भक्तों का. अगर किसी ने कह दिया की  “मोदी के नेतृत्व में भारत में असहिष्णुता में इजाफा हुआ है” तो जवाब मिलेगा की “आपको हिम्मत कैसे हुई भारत को असहिष्णु कहने की ?”

 चलिए वापस अपनी कहानी पर आते हैं. प्रधानमंत्री वाजपेयी, जिन्होंने श्री मोदी पर कृपा करते हुए, उन्हें मुख्यमंत्री पद से निकाल देने के बजाये, बा-इज़्ज़त गोवा में भाजपा की बैठक के दौरान इस्तीफ देकर निकलने का मौका देने के लिए सहमत हुए थे, इस प्रक्रिया के पहले शिकार बने। वाजपेयी के पीठ पीछे, मोदी के करीबी मित्र श्री अरुण जेटली, जो उस वक़्त वाजपेयी के मंत्रिमंडल में एक अपेक्षाकृत जूनियर मंत्री थे और कुशाभाऊ ठाकरे, जो आरएसएस के आदमी थे, और उस समय भारतीय जनता पार्टी के महासचिव थे, ने मिलकर भाजपा में मोदी के भक्तों को एकजुट करवाया, और प्रधानमंत्री वाजपेयी के खिलाफ एक विद्रोह का षड़यंत्र रच डाला। वाजपेयी को इनके सामने झुकना पड़ गया, और इसके वह फिर कभी मोदी या उनके आरएसएस के भक्तों के रास्ते में में नहीं आये। [2]

यहां तक कि जब मोदी के ब्रिटेन यात्रा के लिए एक योजना बनाई गयी, जिसपर भारत और ब्रिटेन दोनों ही देशों के राजनयिकों ने आपत्ति की थी, और मोदी के अहंकार की वजह से  ब्रिटेन के साथ संबंधों में खटास का खतरा बन रहा था, तब भी भारत के हितों को किनारे कर, वाजपेयी को मोदी के अहंकार और उसके भक्तों की मांगों के आगे झुकना पड़ गया था। [3] अगले दशक में, यह रोग भारत के एक बड़े हिस्से में एक महामारी की तरह फैल गया।

फैलाव

भक्ति की बिमारी संक्रामक तो है, पर ये बाकी बीमारियों से अलग भी है. यह छूने, छींकने, या रक्त और यौन संपर्क के माध्यम से नहीं फैलती है। यह इन्फेक्शन प्रोपगैंडा के माध्यम से एक इंसान से दूसरे के दिमाग तक फैलता है।

एक बार एक व्यक्ति को एक निश्चित स्तर से ज्यादा इन्फेक्शन हो जाता है, तो मात्र एक कॅरियर के बजाए एक एजेंट में तब्दील हो जाता है। आप अक्सर ये पाएंगे कि भक्त सबसे सक्रिय रूप से सभी प्रकार के मोदी समर्थक प्रोपगैंडा के प्रचार में लगे रहते हैं – उनकी उपलब्धियों के बारे में फोटोशॉप फ़र्ज़ी चित्र, उनके काम के बारे में बेबुनियाद अफ़वाहें, और तकरीबन हर हफ्ते ही, और ज़रुरत से ज्यादा  “क्या आप मोदी का समर्थन करते हैं – हां / नहीं” वाले पोल्स आदि ।  स्वतंत्रता सेनानियों, सेना और ऐसी कई अन्य चीजें जिनको आम तौर पर गैर-भक्त इंसान भी आदर के साथ देखता है, की छवियों का उपयोग – गैर-भक्त इंसान को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए, और मौजूदा भक्तों के भीतर मोदी के प्रति भक्ति को बढ़ाने के लिए।

प्रोपगैंडा की यह लगातार बमबारी सुनिश्चित करती है कि एक बार कोई भक्त बना, तो उसकी भक्ति की हालत तेजी से गंभीर हो जाती है। अक्सर भक्ति के सबसे हल्के इन्फेक्शन भी जल्दी ही चरम भक्ति में बदल जाते हैं। आप अपने किसी नव संक्रमित दोस्त या रिश्तेदार में इस बात पर ध्यान दीजियेगा – वह पहले कुछ हल्के संघी प्रोपगैंडा, अक्सर सेना या धर्म के बारे में बड़ी चतुराई से छुपाया हुआ कुछ होगा, जिससे कोई राजनीतिक तौर पर तटस्थ व्यक्ति भी सहमत हो सकता है (उदाहरण के लिए, फेसबुक पर किसी “नरेंद्र मोदी 2019 पेज” द्वारा “क्या आप भारतीय सेना के इस शहीद का समर्थन करते हैं?”)

लोगों को ब्रेनवाश करने के यही सिद्धांत और तकनीकों का प्रयोग हिटलर के नाजियों द्वारा भी किया गया था और इस्लामी जिहादियों द्वारा भी किया जाता है। कभी कभी यह इतना असरदार हो सकता है कि इस्लाम के कुछ धर्मान्तरित युवक अचानक बहुत कट्टरपंथी बन जाते हैं, यहाँ तक की आतंकवादी घटनाओं में भी शामिल हो जाते हैं ।

प्रोपगैंडा की तकनीकें

प्रोपगैंडा की बुनियादी तकनीकें, जो सबसे पहले नाजी प्रोपगैंडा मंत्री गोएबबेल्स द्वारा 1930 में तैयार की गयीं थीं, आज भी व्यापक रूप से इस्तेमाल हो रहीं हैं।


इन्हें पहचान लेना बहुत ज़रूरी है, ताकि आप खुद ही नहीं इनसे प्रभावित ना हो जाएँ। इसनलिये विशेष रूप से मैंने संघी प्रोपगैंडा पृष्ठों के द्वारा उनके उपयोग के उदाहरण भी प्रदान किये हैं।

  1. शानदार सामान्योक्तियां – उत्पाद या व्यक्ति के लिए बार बार प्रशंसा के शब्द दोहराना; अच्छाई या देशभक्ति की तरह अच्छे शब्दों से उसकी छवि को जोड़ना ।
    • “कड़ी मेहनत करने वाला प्रधानमंत्री”, “यह है सच्चा देशभक्त”
  2. नेम कॉलिंग – एक अन्य उत्पाद या व्यक्ति की छवि खराब करने के लिए बार बार उसे बुरा कहना ।
    • “देश-द्रोही”, “छद्म सिक्युयलर”, “खबरंडी”, बंगाल, केरल या कैराना में हिंदुओं की हत्या के बारे में झूठी अफवाहें फैलाना ।
    • विकीलीक्स, या रतन टाटा द्वारा मोदी के गुणगान के फ़र्ज़ी चित्र; मोदी द्वारा खुद अपनी ही तारीफ़ करते हुए किसी भी अनुकूल लेख (शायद पेड न्यूज़ वाले भी) के बारे में लगातार ट्वीट करना।
  3. सादे लोग – आम लोगों के परिवार, स्वास्थ्य और देशभक्ति में उनके मूल्यों का इस्तेमाल करना ।
    • अब आप समझे कि क्यों मोदी जब अपनी ही माँ से मिलने जाते हैं तो भी एक कैमरमैनों का जत्था लेकर क्यों चलते हैं, और इसको लेकर काफी हंगामा क्यों मचाया जाता है।
  4. बैंडवैगन प्रभाव – उस टीम में शामिल होने की अपील जिसकी “जीत-निश्चित” है, आपको यह यकीन दिलाने की कोशिश कि आप उस काम में शामिल होने जा रहे हैं जो कि “हर कोई कर रहा है।”
    • चुनाव में भाजपा या किसी दल के लिए बड़ी जीत की भविष्यवाणी करने वाले, या नोटबंदी के लिए 92% का समर्थन दर्शाने वाले अधिकांश नकली ओपिनियन पोल्स इसी कारण के लिए करवाये जाते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि क्यों कुछ पृष्ठों पर 30,000 लोगों को हर हफ्ते ही “क्या आप मोदीजी के साथ हैं?” जैसे सवालों पर हां/नहीं का मतदान करवा कर शेयर करवाया जाता है?
  5. स्थानांतरण/जुड़ना – एक ऐसी अपील जो एक व्यक्ति को किसी तस्वीर के हिस्से के रूप में खुद की कल्पना करने में मदद करता है।
    • भारतीयों की एक बड़ी संख्या के द्वारा आदर दिए जाने वाले सेना, ध्वज, धार्मिक प्रतीकों, स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मोदी की तस्वीर।
  6. कार्ड स्टैकिंग- तथ्यों को तोड़ मड़ोड़ कर किसी चीज़ को बढ़ाचढ़ा कर बेहतर दिखाने की कोशिश, अक्सर यह अनुचित तुलना या तथ्यों को छुपाकर किया जाता है।
    • ‘गुजरात मॉडल’, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)’ विकास, ग्रामीण विद्युतीकरण, या राजमार्गों के निर्माण कार्य प्रगति के बारे में बहुत सारे झूठ या फिर आधे सच; कुछ पुराने विदेशी अनुबंधों का मोदी की विदेश यात्राएं और ‘मास्टरस्ट्रोक’ के परिणाम के रूप में पेश किया जाना।

विशेष रूप से, निम्न वेबसाइटें, जो कि मोदी प्रोपगैंडा के मुखपत्रों में शामिल हैं, अक्सर अफवाहें और नकली खबर फैलाते हैं:

  • swarajyamag.com/
  • indiafacts.co.in/
  • www.opindia.com/
  • www.hvk.org
  • satyavijayi.com
  • www.theLotPot.com
  • www.thefrustratedindian.com
  • DainikBharat.org
  • Shankhnaad.net
  • viralIndia.com
  • OneIndia.com
  • Postcard.news

प्रकार

भक्तों की 2 वैचारिक श्रेणियां हैं:
  1. धार्मिक भक्त : वह भक्त है जो सोचता है कि वह हिंदुत्व का समर्थन करता है (वास्तव में अक्सर बिना यह जानते हुए भी कि क्या इस शब्द का अर्थ होता क्या है!)। वह मोदी का समर्थन इसलिए करता है क्योंकि उसे लगता है मोदी गुजरात में 2002 के नरसंहार के लिए जिम्मेदार था । वह इस बात से खुशी महसूस करता है कि श्री मोदी ने मुसलमानों को मरवाकर उन्हें एक अच्छा सबक सिखाया है।
  2. आर्थिक भक्त: इस श्रेणी का भक्त इस ग़लतफ़हमी में है कि मोदी अर्थशास्त्र के कोई प्रकाण्ड पंडित हैं, और इकॉनमी के मसीहा हैं  वह मोदी का समर्थन इसलिए करता है क्योंकि उसे लगता है मोदी गुजरात में 2002 के नरसंहार के लिए जिम्मेदार नहीं था । उसे यह मानने के लिए ब्रेनवाश कर दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को किसी तरह की ‘क्लीन चिट’ दे दी है, और यह सब मोदी को बदनाम करने के लिए “मोदी हेटर्स” की एक बहुत बड़ी साजिश थी। इस श्रेणी के भक्त मुख्य रूप से साल 2006-7 के बाद से दिखाई पड़ने लगे, जब श्री मोदी ने अपनी छवि को सुधारने और फिर से बनाने के लिए के लिए दुनिया भर की सबसे मशहूर पी.आर. फर्म APCO की सेवाओं को खरीदा । [4]
जबकि गुजरात में 2002 के नरसंहार पर भक्तों की इन 2 श्रेणियों का पूरी तरह से अलग रुख है, फिर भी इनकी आपस में बहुत बनती है। धार्मिक भक्तों की मौजूदगी में, यहां तक कि आर्थिक मोदी भक्त भी 2002 के नरसंहार के दौरान में मोदी के कार्रवाई को एक “प्रतिक्रिया” के रूप उचित ठहराने की कोशिश करते हैं, , और जब धार्मिक भक्तों द्वारा हत्याओं को सन्दर्भ देकर औचित्य दिया जाता है, तब इन्हें भी कोई नैतिक पश्चाताप या घृणा महसूस नहीं होती है।

भक्ति के स्तर

1. परम

इस गंभीरता से संक्रमित एक भक्त को मोदी के अलावा किसी अन्य चीज के बारे में कोई परवाह नहीं होती है। तो, जब श्री मोदी आधार, एफडीआई, जीएसटी या मनरेगा जैसे किसी योजना की खिल्ली उड़ाते हैं, वह उन्हें भी घृणित पाता है, और वह भी उनकी खिल्ली उड़ाता हैं। बाद में, जब मोदी यू-टर्न लेकर खुद ही इन्ही योजनाओं की तारीफ करते हैं, उसके मस्तिष्क में कोई विरोधाभास या पाखंड दर्ज नहीं हो पाता है, और वह आँख मूँद करके और जोरदार तरीके से, उसी जोश/जूनून के साथ जिससे उसने पहले इसी चीज़ का विरोध किया था, नई स्थिति का समर्थन करता है।

ऐसे भक्त मोदी की नोटबंदी के कारण सैकड़ों भारतीयों की मौत की अनदेखी करेंगे, और अभी भी मोदी की सनक और मूर्खता का औचित्य साबित करने में लगे रहते हैं।  अगर कल यह खुलासा होता है कि नरेन्द्र मोदी वास्तव में एक पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट था, जिसे भारत को तबाह करने के लिए भेजा गया था, इस श्रेणी के भक्त बिना कोई भी संकोच किये एक पलक में “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे चिल्लाने लगेंगे।

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के एक भक्त के मस्तिष्क की गतिविधियों का, एक लोबोटॉमी करवाये हुए व्यक्ति से, कोई अंतर नहीं निकाला जा सकता है।

2. नरम

यह संक्रमण का पहला चरण है। इस भक्त के मस्तिष्क की कोशिकायें, इन्द्रियां और तंत्रिका प्रणाली (नर्वस सिस्टम) अभी भी श्री मोदी के कार्यों के साथ समस्या या पाखंड को देख सकते हैं।इस भक्त के मस्तिष्क की कोशिकायें, इन्द्रियां और तंत्रिका प्रणाली (नर्वस सिस्टम) अभी भी श्री मोदी के कार्यों के साथ समस्या या पाखंड को देख सकते हैं। हालांकि, उनकी संक्रमण सुनिश्चित करता है कि उसका मस्तिष्क फिर भी इस तरह के कार्यों के लिए कोई बहाना या औचित्य ढूंढ ही लेता है ।

कुल मिला जुला कर इस तरह के बहाने आमतौर पर इन दो पर पहुँच जाते हैं:

  • “तब तुम कहाँ थे?” – औरों ने भी तो किया था
    • 2002 के बारे में हर सवाल के जवाब में “और 1984 में क्या हुआ?”, मुसलमानों के साथ बुरे व्यव्हार के बारे में हर सवाल के जवाब में “आपने कश्मीरी पंडितों या औरंगजेब के बारे में क्या किया?” आदि दिया जाता है.
  • TINA (There Is No Alternative यानि कोई विकल्प नहीं है) – इस तरह के एक भक्त को यह भ्रम है कि हमारे देश में सांसदीय लोकतंत्र के बजाए एक राष्ट्रपति आधारित प्रणाली है, और सिर्फ पार्टी का मुखिया या लीडर, न कि पूरी कैबिनेट, वास्तव में शासन चलाता है।
    • हालांकि, उन राज्यों में जहां भाजपा के एक मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने से भी कतराती है, इस तरह का भक्त अभी भी भाजपा का समर्थन करता है, आपको ये उपदेश हुए कि संसदीय लोकतंत्र सिर्फ एक नेता के आधार पर नहीं चलता है।

अगर कल यह खुलासा होता है कि नरेन्द्र मोदी वास्तव में एक पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट था, जिसे भारत को तबाह करने के लिए भेजा गया था, इस श्रेणी के भक्त “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाने में हिचकिचाएंगे ।

भक्ति के खतरे

तो फिर, सवाल ये उठता है, यही कारण है कि क्यों न हम बस भक्तों को एक मजाक के रूप में देखकर नजरअंदाज कर दिया करें? आखिर हम क्यों परवाह करें की भक्त क्या करते हैं? आखिर महीन उनसे मुंह लगने, यहां तक कि उनके इलाज करने के लिए कोशिश करने की क्या ज़रुरत है?

यही वजह है कि श्री मोदी या डोनाल्ड ट्रम्प की तरह के लोग आज इस मुकाम पर पहुँच गए हैं, क्योंकि एक बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें एक मजाक के रूप में नजरअंदाज कर दिया, और खतरे को गंभीरता से नहीं लिया था। जब 2009-14 के दौरान हमारे करीबी दोस्त और रिश्तेदार मोदी के बारे में फोटो-शॉप किये गए फ़र्ज़ी प्रोपगैंडा को पोस्ट कर रहे थे, तब हम सब अपने रोज़ाना के जीवन में बहुत व्यस्त थे, इस प्रोपगैंडा को चुनौती देने के लिए हम लोगों में से किसी के पास समय नहीं था। शायद, हम भी कभी कभार उनके से सहमत भी हो जाते थे।

जैसा कि ऊपर उल्लेख है,भक्ति का रोग प्रोपगैंडा के माध्यम से फैलता है। यहां तक कि अगर आप प्रोपगैंडा की उपेक्षा कर सकते हैं, और समझ लीजिये कि आपने इस इन्फेक्शन से बचने का टीका लगवा रखा है, पर अगर आप इसे चुनौती नहीं है, आपके अपने प्रियजन तो फिर भी इसके शिकार हो सकते हैं। क्या आप उस आदमी की तरह जीना चाहते हैं जिसे बहरों के देश में अकेला सुनाई देता हो ? इससे भी खराब स्थिति ये है, यदि किसी समाज भक्तों का अनुवात बढ़ता है तो न केवल उन लोगों के बीच समझदारी से भरी और तर्कसंगत सोच में गिरावट आ जाती है, चरम भक्त किसी भी विरोध की ओर सोशल मीडिया पर आक्रामक होते हैं और गाली गलौज पर उतर आते हैं। उनके द्वारा उनके मालिक के हर काम की कट्टरता के साथ रक्षा, हमारे लोकतंत्र के मूल बुनियाद को कमज़ोर करता है – सत्ता पर सवार लोगों में एक जवाबदेही, और असहमति और विरोध बर्दाश्त करने की क्षमता।

हम पहले से ही देखा है चरम भक्त सोशल मीडिया पर कैसे कई अल्पसंख्यकों और मोदी विरोधी समझे जाने वाले लोगों को किस तरह परेशान कर रहे हैं और उनके साथ किस तरह गाली गलौज और अभद्र व्यव्हार करते हैं। खुद को हिंदू धर्म के ठेकेदार बताने वाले लोग जिन्होंने कालबुर्गी, दाभोलकर और पंसारे जैसे तर्कवादीयों को मार डाला, गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले, जिन्होंने गोमांस खाने के संदेह में अखलाक को मार डाला; हमारी राजधानी की एक अदालत के अंदर आरोपी पर हमला करने वकील; या सोशल मीडिया पर वो ट्रोल्स जो विरोधियों और महिला पत्रकारों को भद्दी गालियां देते हैं – ये सब सिर्फ कुछ व्यक्तियों पर ही हमले नहीं हैं, ये हमारे देश की लोकतांत्रिक परंपराओं पर हमले हो रहे हैं।

और, देश के संविधान का अंतिम मसौदा पेश करते समय जैसा कि बाबासाहब डॉ अम्बेडकर ने हमें चेतावनी दी थी, राजनीति में भक्ति का नतीजा तानाशाही होता है। [5] 

क्या भक्ति का इलाज संभव है?

नरम भक्तों, जिनका अभी भी पूरा ब्रेनवाश नहीं हुआ है, उनको कभी कभी ना केवल बचाया जा सकता है, बल्कि पूरी तरह से “डी-मोदी-फाई” भी किया जा सकता है।

चरम भक्तों के साथ आप धैर्य से मुकाबला करके उन्हें बेअसर कर सकते हैं ताकि वे और अधिक भक्तों की भर्ती नहीं कर पाए, लेकिन उनका फटाफट इलाज होने की उम्मीद नहीं है – आप उनसे संपर्क बनाये रखिये (केवल गाली गलौज न करने वाले प्रकार के), दिमाग में बात ठूंसते रहिये, और लगे रहिए।

यह मिशन आपको अक्सर निरर्थक दिखाई देगा, आपको शक और दुविधा भी होगी ।

लेकिन, मेरा यकीन मानिये, सार्वजनिक रूप किसी भी सामाजिक मीडिया प्लेटफॉर्म – फेसबुक, WhatsApp, ट्विटर, जिसपर एक परम भक्त प्रोपगैंडा फैला रहा है, उसका मुकाबला करके आप देश के लिए एक बहुमूल्य सेवा कर रहे हैं :

  • यह प्रोपगैंडा के प्रभाव को कम कर देता है, इसलिए उसे अधिक भक्त बनाने से रोकता है।
  • यह उसके हाल में बने भक्तों को वापस अक़्लमंदी दिलवा सकता है
  • आपका जवाबी प्रोपगैंडा धीरे-धीरे उसके इन्फेक्शन को भी कमज़ोर करता है।

याद रखें, अगर आप सिर्फ एक भक्त को भी उसकी हालत से बचाने में सफल होते हैं, तो भी यह न केवल आपकी मातृभूमि, लेकिन पूरे मानव जाति के लिए एक महान सेवा है।

इलाज

आपको लगातार भक्त के प्रोपगैंडा पर सवाल उठाते रखने की जरूरत है। इस के लिए, आप गैर-भक्त स्रोतों पर खंडन के लिए पढ़ने की जरूरत है। ज्यादातर मामलों में एक सरल गूगल खोज अक्सर अफवाहें उजागर कर देती है, अन्य मामलों में, आप जवाब खोजने के लिए कुछ गैर-भक्त सोशल मीडिया पृष्ठों का उपयोग कर सकते हैं । (मैं व्यक्तिगत रूप से इसके लिए SMHoaxSlayer पेज की सिफारिश करूंगा)

नीचे भक्तों के बहुत आम प्रोपगैंडा का जवाब देने के लिए एक बुनियादी सहायक फ़्लोचार्ट दिया गया है।

भक्त: गुजरात दंगों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा मोदी को उनके सभी शत्रुओं को गलत साबित करते हुए क्लीन चिट दिया गया था ।
आप: "जब आज तक सुप्रीम कोर्ट में मोदी के खिलाफ कोई मुक़द्दमा अभी चला ही नहीं; तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक "क्लीन चिट" देने का सवाल ही नहीं उठता। जाकिया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट से दंगो के मास्टरमाइंड के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की याचिका दायर की थी; और सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को एसआईटी की स्थापना के लिए आदेश दिया। इस एसआईटी पर गुजरात पुलिस के अधिकारियों का वर्चस्व था; जो खुद ही एक आरोपी संगठन था। बेस्ट बेकरी और बिलकिस बानो मामलों को राज्य के बाहर स्थानांतरित करते समय सुप्रीम कोर्ट ने मोदी व गुजरात सरकार पर किए गए बहुत संगीन टिप्पणियाँ की हैं।"

भक्त: ठीक है.  लेकिन अगर मोदी दंगों में इतना बड़ा दोषी था तो क्यों यूपीए सरकार मोदी को पकड़वाने के लिए आखिर क्यों कुछ नहीं कर सकी ?
आप: जांच आयोग कानून के अनुसार यदि पहले से ही राज्य सरकार की ओर से जांच आयोग सेटअप द्वारा किसी मामले पर छानबीन की जा रही हो तो फिर उसी मामले के लिए की केंद्र सरकार को नया जांच आयोग बनाने की अनुमति नहीं है। जैसे ही यू पी ए सत्ता में आई थी मोदी ने नानावती आयोग के दायरे (टर्म्स ऑफ़ रिफरेन्स) को बढ़ा डाला. नानावती आयोग सिर्फ सच पर पर्दा डालने और भाजपा के पसंद की कहानी को पेश करने के लिए बनाया गया था। गोधरा ट्रेन आगजनी के मास्टरमाइंड पर इसके निष्कर्ष निचली अदालत के जांच में भी नहीं टिक पाए।

भक्त: ठीक है. लेकिन मोदी ने एक बेहद सक्षम प्रशासक  और एक महान नेता है।
आप: सक्षम प्रशासक अपनी आँखों के सामने एक नरसंहार नहीं होने देते हैं। वे इसके दोषी किसी कातिल या अपराधी को मंत्री पद पर नियुक्त नहीं करते हैं। जैसा कि मोदी ने अपने भड़काऊ भाषणों में दिखाया वो एक संकीर्ण विचारधारा वाला नेता है जो एक समुदाय के खिलाफ घृणा फैला कर अपनी दूकान चलाता है . जबकि सच्चा लीडर सब को एक साथ लेकर चलने के लिए प्रयास करता है।

भक्त: अच्छा . उस अवधि को भूल जाइये.  मोदी अब एक सुधारा हुआ इंसान है.  और उसका गुजरात मॉडल के द्वारा गुजरात देश में शीर्ष राज्य बनने में बेहद सफल रहा था।
आप: वास्तव में डेटा के आधार पर देश के सभी राज्यों के बीच में राज्य के "सकल घरेलू उत्पाद में" विकास के मामले में गुजरात 14 वीं स्थान पर था। यहां तक कि अगर आप बहुत छोटे राज्यों को बाहर भी कर दें कई बड़े राज्यों का प्रदर्शन भी गुजरात से बेहतर था। और तो और मानव विकास सूचनांक के आंकड़ों में गुजरात की स्थिति अपने तरह के कई राज्यों की तुलना में बहुत खराब थी। मनरेगा पर अपने यू-टर्न और नोटबंदी के तुगलकी फरमान के साथ मोदी ने ये दिखा दिया है कि वह कोई अर्थशास्त्र का जीनियस या एक मुक्त बाजार के मसीहा नहीं बल्कि लेकिन एक अनाड़ी तानाशाह के सामान है जो संदिग्ध ख्याति के नीम हकीमों से प्रभावित हो जाता है।

भक्त: ठीक है. लेकिन मैं पार्टी विचारधारा के बारे में परवाह करता हूँ और अकेली भाजपा ही एक देशभक्त पार्टी है।
आप: सच्ची देशभक्त पार्टी जब विपक्ष में भी रहती है तो देशभक्ति दिखाती है। वे आधार एफ.डी.आई. और परमाणु संधि जैसे देशहित के कदमों को सिर्फ अड़ंगा डालने की खातिर विरोध नहीं करते। अगर उन्हें राष्ट्रीय हित की परवाह होती तो वे 5 साल तक जीएसटी को नहीं रोके रहते। सच्चे देशभक्त तिरंगे झंडा और राष्ट्र पिता का सम्मान करते हैं और उनके कातिल की पूजा नहीं करते हैं। सच्चे देशभक्त अपने ही देशवासियों को गद्दार या देशद्रोही बुला कर देश में फूट नहीं डालते हैं। क्या आप जानते भी हैं कि आखिर हिंदुत्व की विचारधारा है क्या ? और कैसे इनके स्थापकों ने फासीवाद और यहूदियों के नरसंहार की भी प्रशंसा की थी?

आखिर में

भक्तों को, सहानुभूतिपूर्वक, एक सामान्य व्यक्ति जैसा समझिये जो एक रोग से पीड़ित है। वह सिर्फ प्रोपगैंडा और ब्रेनवाश का शिकार है। आपको उनके साथ निपटने के लिए धैर्य की आवश्यकता होगी। इलाज का प्रयास हल्के नरम मामलों से शुरू करें, शुरू शुरू में ही एक परम भक्त के इलाज करने का प्रयास मत करिये। ध्यान रखें, इस हालत पहले से ही जनसंख्या का लगभग एक तिहाई को प्रभावित हो चूका है, इसलिए इसके और फैलने से रोकना एक देश के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण काम बन चुका है।

इस महामारी को चुपचाप आगे बढ़ने देना का विकल्प अब हमारे पास नहीं है। तटस्थ रहने पर भी, आप अभी भी रोग और अंधकर के फैलने में मदद कर रहे हैं। किसी फ़र्ज़ी गुरु की अंधे अनुक्रण की तरह फैलते हुए जिस तरह से तार्किक सोच को नुक्सान पहुँच रहा है, यह पागलपन एक दिन आपके पीछे भी ज़रूर पड़ जाएगा।

इसके अलावा, अंत में याद रखिये, आपका उद्देश्य अपने खुद के पसंदीदा नेता का एक नया भक्त बनाने के लिए नहीं है! किसी मोदी भक्त को केजरीवाल या नेहरू परिवार या कार्ल मार्क्स के भक्त में परिवर्तित करना समस्या का समाधान नहीं है, यह केवल समस्या बदलता है। आपका उद्देश्य भक्त के दिमाग से संघी प्रोपगैंडा के प्रभाव को बाहर निकालना, और उसे तर्कसांगत और समालोचन की सोच की तरफ ले जाना है, ताकि वह आगे चलकर आँख बंद करके किसी भी एक व्यक्ति का भक्त नहीं बन जाए।

मित्रों, प्रकाश को फैलाएं, हर एक – सुधारो एक!

सन्दर्भ

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